Monday, 10 August 2020

शहादतनामा

 खुदीराम बोस

(आज के हालातों में हमें अपने वीर शहीदों से देशभक्ति के मूल्यों को सिखने की जरूरत है। खुदीराम बोस व साथियों को सच्ची श्रदांजलि तभी अर्पित की जा सकती है जब हम उनके दिखाए रास्तों पर चलते हुए इस शोषणकारी व्यवस्था का प्रतिरोध कर सकेंगे।)

खुदीराम बोस मात्र 19 वर्ष की उम्र में हिंदुस्तान की आजादी के लिए फांसी पर चढ़ गये। छात्र जीवन से ही इनके मन में हिंदुस्तान पर अत्याचारी सत्ता चलाने वाले ब्रिटिश राज को नेस्तनाबूद करने की ज्वाला धधक रही थी। अपने संकल्प को पूरा करने हेतु अद्वितीय धैर्य का परिचय देते हुए इन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य पर पहला बम फेंका और हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर चढ़कर इतिहास रच दिया। कुछ इतिहासकारों की धारणा है कि वे देश के लिए फांसी पर चढ़ने वाले सबसे कम उम्र के क्रांतिकारी थे। लेकिन खुदीराम से पूर्व 17 जनवरी, 1872 को 68 कूकाओं के सार्वजनिक नरसंहार के समय 13 वर्ष का बालक भी शहीद हुआ था। उपलब्ध तथ्यों के अनुसार, बालक को जैसे ही तोप के सामने लाया गया, उसने लुधियाना के डिप्टी कमिश्नर कावन की दाढ़ी कसकर पकड़ ली और तब तक नहीं छोड़ी जब तक उसके दोनों हाथ तलवार से काट नहीं दिए गए। बाद में उसी तलवार से उसे मौत के घाट उतार दिया गया था।
खुदीराम का जन्म 3 दिसंबर, 1889 को पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के बहुवैनी नामक गांव में बाबू त्रिलोकी नाथ बोस के यहां हुआ था। उनके माता का नाम लक्ष्मी प्रिया देवी था। बाल्यावस्था में ही खुदीराम के मन में देश को आजाद कराने की ऐसी ज्वाला जली कि उन्होंने नौवीं कक्षा के बाद ही पढ़ाई छोड़ दी और भारतीय मुक्ति संग्राम में कूद पड़े। स्कूल छोड़ने के बाद वे रिवॉल्यूशनरी पार्टी के सदस्य बने और वंदेमातरम गीत के पैंफलेट वितरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सन् 1905 में बंगाल विभाजन(बंग-भंग) के विरोध में चलाए गए आंदोलन में भी उन्होंने बढ़-चढ़कर भाग लिया।
फरवरी, 1906 में मिदनापुर में एक औद्योगिक तथा कृषि प्रदर्शनी लगी हुई थी। प्रदर्शनी देखने के लिए आसपास के प्रांतों से हजारों लोग आए थे। बंगाल के एक क्रांतिकारी सत्येंद्रनाथ द्वारा लिखे "सोनार बांग्ला" नामक ज्वलंत पत्रक की कॉफी प्रतियां खुदीराम ने इस प्रदर्शनी में बांटी। एक पुलिस वाला उन्हें पकड़ने के लिए भागा। खुदीराम ने सिपाही के मुंह पर घूंसा मारा और शेष पत्रक बगल में दबाकर भाग गए। इतिहासवेत्ता मालती मलिक के अनुसार, 28 फरवरी 1906 को वे गिरफ्तार कर लिए गये, लेकिन वे किसी तरह कैद से भाग निकले। दो माह बाद अप्रैल में वे फिर से पकड़े गए और उन पर राजद्रोह के आरोप में अभियोग चलाया गया, पर कोई गवाह नहीं मिलने के कारण 16 मई, 1986 को उन्हें रिहा कर दिया गया। दिसंबर, 1907 में खुदीराम ने नारायणगढ़ रेलवे स्टेशन पर बंगाल के गवर्नर की ट्रेन पर हमला किया, पर गवर्नर बच गया। सन् 1906 में उन्होंने दो अंग्रेज अधिकारियों - वाट्सन और पैम्फायल्ट फुल्लर पर बम से हमला किया, लेकिन वे भी बच गये।


न्यायाधीश किंग्स फोर्ड को मारने की योजना


मिदनापुर में "युगांतर" नाम की क्रांतिकारियों की गुप्त संस्था के माध्यम से खुदीराम पहले ही क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़ चुके थे। सन् 1905 में लार्ड कर्जन ने जब बंगाल का विभाजन किया तो उसके विरोध में सड़कों पर उतरे अनेकों भारतीयों को कोलकाता के मैजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड ने क्रूर दंड दिया। अन्य मामलों में भी वह क्रांतिकारियों से बेहद क्रूरता से पेश आता था। इसके परिणामस्वरूप, सरकार ने किंग्स फोर्ड को पदोन्नति देकर मुजफ्फरपुर में सत्र न्यायाधीश बनाकर भेज दिया। "युगांतर" की एक बैठक में किंग्सफोर्ड को मारने का निश्चय हुआ। इस कार्य हेतु खुदीराम तथा प्रफुल्ल कुमार चाक्की का चयन किया गया। खुदीराम को एक बम और पिस्तौल दी गई। प्रफुल्ल कुमार को भी एक पिस्तौल दी गई। दोनों ने मुजफ्फरपुर आकर सबसे पहले किंग्सफोर्ड के बंगले की टोह ली। उन्होंने उसकी बग्गी तथा उसकी घोड़े का रंग अपने दिमाग में बिठा लिया। खुदीराम तो किंग्सफोर्ड के कार्यालय में जाकर उसे ठीक से देख भी आए।

अंग्रेज अत्याचारीयों पर पहला बम

30 अप्रैल, 1908 को दोनों किंग्सफोर्ड के बंगले के बाहर घोड़ा गाड़ी से उसके आने की राह देखने लगे। बंगले की निगरानी हेतु वहां मौजूद पुलिस के गुप्तचरों ने उन्हें हटना भी चाहा, पर वे दोनों एक अच्छा सा बहाना गढ़कर वहीं डटे रहे। रात के 8:30 बजे के आसपास किंग्सफोर्ड की बग्गी के समान दिखने वाली गाड़ी आते देखकर खुदीराम गाड़ी के पीछे भागने लगे। रास्ते में बहुत अंधेरा था। जैसे ही गाड़ी किंग्सफोर्ड के बंगले के सामने पहुंची, खुदीराम ने निशाना लगाकर जोर से बम फेंका। हिंदुस्तान के इस बम विस्फोट की आवाज उस रात कई मील दूर तक सुनाई दी और कुछ दिनों बाद तो उसकी आवाज इंग्लैंड तथा यूरोप में भी सुनी गई। पर किंग्सफोर्ड फिर भी बच गया। उस दिन वह क्लब से थोड़ी देर बाद बाहर निकला था। संयोग से गाड़ियां एक जैसी होने के कारण दो यूरोपियन स्त्रियों को अपने प्राण गंवाने पड़े। खुदीराम तथा प्रफुल्ल, दोनों रातों रात वहां से भाग निकले। खुदीराम रात को ही 36 किलोमीटर दूर बने रेलवे स्टेशन पर जा पहुंचे। लेकिन पुलिस उनके पीछे लग गई थी और स्टेशन पर उन्हें घेर लिया। इस कार्य में अज्ञानतावश लोग भी पुलिस के साथ मिल गए थे। ऐसे में खुदीराम अपने देशवासियों पर गोली भी नहीं चला सकते थे। अंत में वे गिरफ्तार कर लिए गये। दूसरी ओर, प्रफुल्ल चाकी ट्रेन से समस्तीपुर जा पहुंचे। पर जिस डिब्बे में बैठे थे, उसमें नंदलाल बनर्जी नामक एक घाघ दरोगा भी बैठा था। बातों ही बातों में वह ताड़ गया और तार द्वारा मुजफ्फरपुर सूचना भेजकर उसे गिरफ्तार करने की योजना बना डाली। जैसे ही बनर्जी, चाकी को पकड़ने के लिए उसकी और बढ़ा, चाकी ने खुद को घिरा देख उस पर गोली चला दी, पर वार खाली गया। पर वीर योद्धा क्षण भर के लिए भी घबराया नहीं और फिर से घोड़ा दबा दिया, पर अबकी बार नली का मुंह अपनी खुद की कनपटी की ओर था। नंदलाल हाथ मलता रह गया और प्रफुल्ल भारत माता की आजादी की बलिवेदी पर अपने प्राण न्यौछावर कर सदा के लिए अमर हो गये।
खुदीराम की गिरफ्तारी का अंत भी तय था। 11 अगस्त, 1908 को ये महान सेनानी ने खुशी-खुशी फांसी के फंदे पर झूल गया। किंग्सफोर्ड ने डरकर नौकरी छोड़ दी और जिन क्रांतिकारियों पर उसने जुलम किए थे, उनके भय से शीघ्र ही उसकी मौत भी हो गयी। इतिहासवेत्ता शिरोल के अनुसार, खुदीराम की शहादत के शौक में कई दिनों तक स्कूल-कॉलेज सभी बंद रहे। वे बंगाल के क्रांतिकारियों के आदर्श बन गए थे। वे इतने लोकप्रिय हो गए थे कि बंगाल के जुलाहे एक खास किस्म की धोती बुनने लगे थे, जिसकी किनारी पर खुदीराम लिखा होता था और विद्यार्थी द्वारा नौजवान ऐसी धोती पहनने लगे थे।
मुजफ्फरपुर जेल में जिस मजिस्ट्रेट ने फांसी पर लटकाने का आदेश सुनाया था, उसके अनुसार खुदीराम एक शेर के बच्चे की तरह निर्भीकता के साथ फांसी के तख्ते की ओर बढ़ा था। उनकी शहादत से समूचे देश में देशभक्ति की लहर उमड़ पड़ी थी। उनके साहसिक बलिदान की स्मृति में गीत रचे गए, जिन्हें बंगाल के लोकगायक आज भी गाते हैं।

संदर्भ - जरा याद करें कुर्बानी, अभियान प्रकाशन
संपर्क - डॉ. सुरेन्द्र कुमार भारती (9466366060)


Sunday, 9 August 2020

नवयुवकों से दो बातें - 2

 गंताक से आगे........


नवयुवकों से दो बातें

प्रिंस क्रोपाटकिन


3. वकील


अब हम तीसरी कल्पना पर विचार करते हैं। मान लो, तुमने कानून की परीक्षा पास की है और वकालत का पेशा आरंभ करने वाले हो। संभवतः तुम्हें अपने भविष्य के कार्यक्रम के संबंध में भ्रमपूर्ण धारणाएं होंगी। मैं मानता हूं कि तुम एक श्रेष्ठ विचार वाले व्यक्ति हो और परोपकार का महत्त्व भी अच्छी तरह समझते हो। शायद तुम सोचते होगे कि ‘‘मैं जीवन-भर सब प्रकार के अन्याय का लगातार और बलपूर्वक विरोध करता रहूंगा। अपनी समस्त योग्यता कानून की विजय के लिए खर्च करूंगा। जनता के सामने सर्वोच्च न्याय का आदर्श उपस्थित करूंगा। क्या कोई पेशा इससे श्रेष्ठ हो सकता है?’’ इस प्रकार तुम अपने और अपने पसंद किये हुए पेशे के भीतर विश्वास रखते हुए जीवन-क्षेत्र में प्रवेश करते हो।
बहुत अच्छा, हम अदालती रिपोर्टों के पन्ने उलटकर इस बात की जांच करते हैं कि वास्तविक स्थिति क्या है?
अदालत के सामने एक मालदार जमींदार आता है। वह एक झोंपड़ी में रहने वाले किसान को कर्ज अदा न करने के कारण जमीन से बेदखल कराना चाहता है। कानून की दृष्टि से मुकदमे में किसी प्रकार की उलझन नहीं है, क्योंकि जब गरीब किसान कर्ज नहीं चुका सकता, तो उसे जमीन पर से कब्जा छोड़ देना चाहिए। पर अगर हम इस मामले में वास्तविक घटनाओं की जाँच करते हैं, तो हमें कुछ और ही पता चलता है। जमींदार अपनी आमदनी को ऐश-आराम के कामों में खुले हाथों बरबाद करता रहा है और किसान को उम्र भर हर रोज सख्त काम करना पड़ा है। जमींदार ने अपनी जमींदारी की उन्नति के लिए किसी तरह की कोशिश नहीं की, तो भी दस वर्ष के भीतर उसकी जमीन का दाम पहले से कई गुना हो गया है। जमीन का दाम बढ़ने का कारण है, एक नई रेलवे लाइन का बनना, या किसी बड़ी सड़क का पास से होकर निकल जाना, या दलदल को सुखाकर सूखी जमीन बना लेना, या ऊसर जमीन को खेती के लायक बनाना, इत्यादि। पर जिस किसान ने अधिकांश में इस सारी उन्नति के लिए परिश्रम किया, उसे इससे कुछ फायदा नहीं हुआ। वह बरबाद हो गया, साहूकारों के फंदे में फंसकर गले तक कर्ज में डूब गया और अब उसमें कर्ज अदा करने की भी सामर्थ्य नहीं रही। कानून सदा जायदाद वाले के पक्ष में रहता है। उसका अर्थ स्पष्ट है, और उसके अनुसार जमींदार न्याय पर है, पर तुम्हारा न्याय का भाव अभी कानूनी किस्सों से ढक नहीं गया है। तुम इस मामले में क्या करोगे? क्या तुम मान लोगे कि किसान को निकालकर बाहर सड़क पर डाल दिया जाये, क्योंकि कानून की यही मंशा है? अथवा तुम इस बात पर जोर दोगे कि जमींदार को जमीन की तमाम बढ़ी हुई आमदनी किसान को वापस कर देनी चाहिए! क्योंकि वह उसी की मेहनत का फल है और यही न्याय का निर्णय है? तुम कौन-सा पक्ष स्वीकार करोगे? कानून के अनुकूल पर न्याय के विरुद्ध या न्याय के अनुकूल और कानून वेफ विरुद्ध?
अथवा, जब किसी कारखाने के मालिक के खिलाफ मजदूरों ने बिना नोटिस दिये हड़ताल कर दी हो, तब तुम किसका पक्ष लोगे? तुम कानून का पक्ष लोगे, जिसका अर्थ है मालिक का पक्ष लेना, जिसने किसी हलचल के मौके से फायदा उठाकर बेहद नफा कमाया है? अथवा तुम कानून के खिलापफ चलकर मजदूरों का पक्ष लोगे, जिनको कभी चालीस या पचास रु० रोजाना से ज्यादा मजदूरी नहीं दी गई और जिनके स्त्री-बच्चे उनकी आंखों के सामने ही भूखों मर चुके हैं? क्या तुम उस जालसाजी से भरे कानून-कायदे का पक्ष ग्रहण करोगे, जोकि ‘इकरारनामे (प्रतिज्ञा) की स्वाधीनता का समर्थन करता है, अथवा तुम सच्चे न्याय का समर्थन करोगे, जिसके अनुसार ऐसा इकरारनामा, जो एक खूब भरे पेटवाले और एक ऐसे आदमी के बीच में हुआ हो, जिसे केवल प्राण-रक्षा के लिए कुछ भी मजदूरी करने की आवश्यकता है, अथवा जो ताकतवर और कमजोर के बीच में हुआ हो, जिसे किसी भी दशा में इकरारनामा नहीं कहा जा सकता?
एक और मुकदमा देखो। किसी बड़े शहर में एक आदमी बाजार में घूम रहा है। वह किसी दुकान से दो सेर आटा चुरा कर भागता है। पकड़े जाने पर जब उससे पूछा गया तो मालूम हुआ कि वह एक अच्छा कारीगर है, जो बिना रोजगार के भटक रहा है, और उसे तथा उसके बाल-बच्चों को चार दिन से एक टुकड़ा भी खाने को नहीं मिला! दुकानदार से अनुरोध किया गया कि वह अपराधी पर दया करके उसे छोड़ दे, पर वह इंसाफ की दुहाई देता है। वह मुकदमा दायर करता है और उस आदमी को छः महीने की जेल हो जाती है, क्योंकि कानून लिखने वाले अंधे, ऐसा ही कह गये हैं। क्या उस समय तुम्हारी अन्तरात्मा में समाज के प्रति विद्रोह का भाव पैदा नहीं होता जब तुम हर रोज इस प्रकार के फैसले होते देखते हो?
अथवा तुम उस आदमी के खिलाफ कानूनी कार्यवाही  करना उचित बतलाओगे, जिसका पालन-पोषण दूषित रीति से हुआ है और जिसे बचपन से ही खोटे काम करने की आदत लगाई गई है, जिसने अपनी तमाम उम्र में सहानुभूति का एक शब्द भी नहीं सुना और अन्त में जिसने कुल जमा सौ रुपए के लालच से अपनी पड़ौसी की हत्या कर डाली? क्या तुम कहोगे कि उसको फांसी दे दी जाये अथवा, इससे भी बढ़कर बीस वर्ष के लिए कैद की सजा दी जाये? क्योंकि तुम अच्छी तरह जानते हो कि वह अपराधी होने के बजाय एक पागल आदमी है, और हर हालत में उसके कसूर के लिए हमारा सारा समाज दोषी है।
क्या तुम यह दावा करोगे कि ये कपड़े बुनने वाले मजदूर, जिन्होंने घोर निराशा के वश होकर मिल में आग लगा दी, कैदखाने में डाल दिए जायें? अथवा यह शख्स, जिसने एक छत्रधारी हत्यारे पर गोली चला दी, उम्र कैद की सजा पाये? अथवा ये बागी, जिन्होंने मोर्चे के ऊपर स्वाधीनता का झंडा खड़ा किया, गोली से मार दिये जायें? नहीं, हजार बार नहीं। अगर तुम उन बातों को दोहराने की बजाय, जो तुमको स्कूलों और कालेजों में पढ़ाई गई हैं, अपनी अक्ल से काम लोगे, अगर तुम कानून का विश्लेषण और जांच-पड़ताल करोगे और उन दुरूह भ्रमपूर्ण कथाओं को अलग फेंक दोगे, जो कानून की असलियत को ढंकने के लिए गढ़ी गई हैं, तो तुम्हें मालूम हो जायेगा कि कानून की असलियत यही है कि बलवान के अधिकार का समर्थन किया जाये। और कानून का मूल-स्वरूप है उन सब अत्याचारों को पवित्र बतलाना, जिनका वर्णन मनुष्य-जाति के प्राचीन और रक्त-प्लावित इतिहास में पाया जाता है। जब तुम इस रहस्य को समझ जाओगे, तो तुम्हें कानून के प्रति भारी घृणा हो जायेगी। तुम समझ जाओगे कि पुस्तकों में लिखे कानून का सेवक बने रहने से तुम्हें हर रोज अपनी अन्तरात्मा से कानून का विरोध करना पड़ेगा। पर इस प्रकार की दुविधाजनक परिस्थिति सदा कायम नहीं रह सकती। अन्त में या तो तुम अपनी अन्तरात्मा को मारकर पूरे धूर्त्त और मक्कार बन जाओगे; अथवा तुम परम्परा की लकीर पर चलना छोड़ दोगे और सब प्रकार के - आर्थिक और राजनैतिक - अन्यायों का पूरी तरह से नाश करने के लिए हम लोगों के साथ मिलकर काम करने लगोगे। पर तब तुम कम्युनिस्ट कहे जाओगे और तुम्हारी गणना क्रांतिकारियों में होगी।


4. इंजीनियर


अब हम चैथी कल्पना पर विचार करते हैं। मान लो, तुम एक नवयुवक इंजीनियर हो और वैज्ञानिक आविष्कारों का उपयोग व्यापार और कारीगरी में करके मजदूरों की दशा सुधारने का स्वप्न देख रहे हो। अभी तुम्हें बहुत धोखे खाने पड़ेंगे, पर वह दिन दूर नहीं, जब तुम्हारा यह भ्रम दूर हो जायेगा। तुम अपनी तरुण बुद्धि और शक्ति को लगाकर एक नई रेलवे की योजना तैयार करते हो, जो ऊंचे स्थानों का चक्कर लगाकर, बड़े पहाड़ों के हृदय को छेदकर, दो अलग-अलग देशों को, जिन्हें प्रकृति ने भिन्न बना रक्खा था, मिला देती है। जब काम शुरू होता है, तो तुम देखोगे कि मजदूरों के दल-के-दल अंधेरी सुरंगों के भीतर भूख-प्यास और बीमारी से मर रहे हैं। दूसरे बहुत-से मजदूर, थोड़े-से पैसे और टी.बी. की बीमारी के बीज लेकर घर लौट रहे हैं। तुच्छ लालच के कारण एक-एक गज रेलवे लाइन मनुष्यों की बलि देकर बनाई जा रही है, अन्त में जब लाइन तैयार हो जाती है, तो तुम देखते हो कि तुम्हारी यह रेलवे लाइन दूसरे देश पर हमला करने के लिए तोपें और सेनाएं भेजने के काम में लाई जा रही है।
दूसरा उदाहरण देखो -- तुम अपनी तरुण अवस्था को एक ऐसा आविष्कार करने में लगाते हो, जिससे माल सहज में बनाया जा सके। बहुत कोशिशों के बाद, बहुत रातों की नींद हराम कर, अंत में तुम अपने आविष्कार में सफल होते हो। तुम उसको व्यवहार में लाते हो और उसका नतीजा तुम्हारे अनुमान से कही बढ़कर निकलता है। दस-बीस हजार प्राणी नौकरी से अलग कर दिये जाते हैं, केवल थोड़े-से बच्चों को नौकर रक्खा जाता है और उनकी हालत भी निर्जीव मशीनों की-सी बना दी जाती है। दो-चार या दस-बीस मालदार कारखानों वाले करोड़ों रुपया पैदा कर लेते हैं और राजसी ठाठ से भोग-विलास में रहने लगते हैं। क्या यही तुम्हारा लक्ष्य था?
इस प्रकार जब तुम आजकल की अन्य प्रकार की यंत्र-विद्या-संबंधी उन्नति पर विचार करोगे, तो तुम्हें मालूम होगा कि कपड़ा सीने की मशीन के आविष्कार से सिलाई का काम करने वाली गरीब औरतों को जरा भी लाभ नहीं हुआ। नई तरह की बरमा मशीन बन जाने पर भी खान में काम करने वाले मजदूरों को गठिया की बीमारी के कारण मरना पड़ता है। अगर तुम सामाजिक प्रश्नों पर उसी स्वाधीन भाव से विचार करोगे, जिससे यंत्र-विद्या संबंधी जांच-पड़ताल करते हो, तो तुम अवश्य इस निर्णय पर पहुँचोगे कि जब तक दुनिया में निजी जायदाद और मजदूरी की प्रथा कायम है, तब तक हरेक नया आविष्कार मजदूरों का अधिक भला करने की अपेक्षा उनकी गुलामी को और मजबूत करता है, उनके काम को और भी नीचा बनाता है, व्यापार-संकट के अवसर को बार-बार लाता है और उसके द्वारा केवल वही आदमी फायदा उठा सकता है, जिसको अब भी सब तरह का बड़े-से-बड़ा सुख प्राप्त है।
जब तुम एक बार निर्णय पर पहुंच गये, तब क्या करोगे? या तो मिथ्या तर्क से अपनी अंतरात्मा को चुप कराओगे और अंत में एक दिन अपनी तरुणावस्था के सच्चे विचारों को सदा के लिए विदा करके केवल अपने लिए ऐशोआराम के साधन प्राप्त करने की कोशिश करने लगोगे व गरीबों को लूटकर खाने वालों के दल में मिल जाओगे। पर, यदि तुम्हारे भीतर सहृदयता का भाव है, तो तुम अपने मन में कहोगे, ‘‘नहीं, यह समय आविष्कार करने का नहीं है। पहले हमें उत्पत्ति तथा संपत्ति के वर्तमान अधिकार को बदलने का उद्योग करना चाहिए। जब निजी जायदाद के नियमों का अंत हो जायेगा, तब यंत्र-विद्या की उन्नति होने से मनुष्यमात्र फायदा उठा सकेंगे और ये असंख्य मजदूर, जो आजकल केवल मशीनों के पुर्जों के समान बने हुए हैं, तब विचारशील प्राणी बन जायेंगे और अध्ययन द्वारा विकसित तथा शारीरिक परिश्रम द्वारा तीव्र बनी हुई अपनी बुद्धि का उपयोग कला-कौशल की उन्नति में करेंगे। इससे आने वाले समय में कला-कौशल की ऐसी आश्चर्यजनक उन्नति हो जायेगी, जिसकी इस समय हम कल्पना भी नहीं कर सकते।


5. शिक्षक


अब हम पाँचवीं कल्पना पर विचार करते हैं । मान लो तुम एक शिक्षक हो। मैं उस शिक्षक की बात नहीं कर रहा जो अपने पेशे को बेगार की तरह समझता है, बल्कि मैं उससे संबोधित हूँ जो आमोद-प्रिय छोटे-छोटे बच्चों के दल के बीच बैठकर उनकी विनोदपूर्ण निगाहों और आनन्ददायक हंसी से प्रसन्न होता है। उस स्कूल-मास्टर से, जो उन छोटे बच्चों के हृदयों में मनुष्य के उन आदर्शों का बीज बोना चाहता है, जिनका अपनी किशोरावस्था में वह विचार किया करता था।
प्रायः मैं तुम्हें रंजीदा देखता हूँ, और मैं जानता हूँ कि तुम्हारी चिंता का कारण क्या है? उसी दिन तुम्हारे एक प्यारे विद्यार्थी ने, जो यद्यपि भाषा में बहुत होशियार नहीं, पर जिसका हृदय बड़ा विशाल है, महाराणा प्रताप की कहानी को बड़े जोश के साथ पढ़कर सुनाया। उसकी आँखें चमक रही थीं और ऐसा मालूम होता था कि वह उसी पल तमाम अत्याचारियों का नामोनिशान मिटा देना चाहता है।
पर जब वही विद्यार्थी घर लौटकर गया, तो उसके माता-पिता तथा चाचा ने, कस्बे के बड़े महंत या पुलिस थानेदार को सलाम न करने के लिए उसे बहुत डांटा-फटकारा। उन्होंने उसे दुनियादारी, अधिकारियों की इज्जत, अपने से ऊंचे दर्जे के लोगों के प्रति विनय के संबंध में बड़ा लंबा भाषण सुनाया, जिससे अंत में उसने महाराणा प्रताप की जीवनी को उठा कर अलग रख दिया और ‘सांसारिक उन्नति के उपाय’ नामक पुस्तक को पढ़ना शुरू किया।
कल ही तुम्हें किसी ने कहा कि तुम्हारे सब होनहार विद्यार्थी उलटे रास्ते पर चल रहे हैं। उनमें से एक सिवा अफसर बनने का स्वप्न देखने के और कुछ नहीं करता, दूसरा किसी बड़े आदमी का कृपापात्र बनकर गरीबों को लूटता है। तुमने इनसे न जाने कैसी-2 आशाएं लगा रखी थीं। अब अपने आदर्शों और दुनिया की असलियत को देखकर तुम चिंता में पड़े हुए हो।
तुम कुछ समय तक चिंता करते रहते हो। पर मैं समझता हूँ कि साल-दो-साल बाद ऐसा समय आएगा, जब बार-बार निराश होकर अंत में तुम अपने आदर्श-ग्रंथों को अलमारी में बंद कर दोगे और कहने लगोगे कि ‘‘महाराणा प्रताप आदमी तो बड़ा स्वाभिमानी और देशभक्त था, पर साथ ही कुछ सनकी भी था।’’ तुम विचार करने लगोगे कि कविता विश्राम के समय में बहुत अच्छी चीज है, खासकर उस हालत में जब एक आदमी दिन भर लड़कों से त्रौराशिक-पंचराशिक का हिसाब समझाते-समझाते थक गया हो, पर कवि लोग कल्पना के राज्य में विचरण करते हैं और उनके विचारों से जीवन-निर्वाह करने में कुछ मदद नहीं मिल सकती और न इंस्पेक्टर आॅफ स्कूल्स के दौरे के समय उनसे कुछ लाभ हो सकता है। अथवा, इसके विरुद्ध यह होगा कि तुम्हारे किशोरावस्था के स्वप्न बड़ी उम्र हो जाने पर दृढ़ विश्वास के रूप में परिणत हो जायेंगे। तुम चाहोगे कि मनुष्यमात्र को, चाहे वह स्कूल में पढ़ता हो या नहीं, विस्तृत और मनुष्योचित शिक्षा दी जाये; पर यह देखकर कि ऐसा हो पाना वर्तमान परिस्थिति में असंभव है, तुम वर्तमान सामाजिक व्यवस्था की जड़ पर ही कुठाराघात करने लगोगे। तब तुम शिक्षा विभाग द्वारा नौकरी से अलग कर दिये जाओगे। तुम्हें स्कूल छोड़कर हम लोगों के बीच में आना पड़ेगा और हमारे ही साथ काम करना पड़ेगा। तुम दूसरे लोगों को, जिनकी उम्र तुमसे ज्यादा होने पर भी जिनकी जानकारी तुमसे कम है, समझाओगे कि ज्ञान कैसी मनोहर वस्तु है, मनुष्य-समाज को कैसा होना चाहिए अथवा वह कैसा बन सकता है। तुम साम्यवादियों के साथ मिलकर वर्तमान सामाजिक व्यवस्था को जड़-मूल से बदलने के लिए उद्योग करने लगोगे, और ऐसा प्रयत्न करोगे, जिससे संसार के लिए सच्ची एकता, सच्चा भ्रातृभाव और अनंत समय तक कायम रहने वाली स्वाधीनता प्राप्त की जा सके। 

नवयुवकों से दो बातें -1

 नवयुवकों से दो बातें - 1

प्रिंस क्रॉपाटकिन 


(प्रस्तावना - आज मैं युवकों से कुछ बातें करना चाहता हूं। बूढ़े लोगों को - दरअसल मेरा मतलब दिल और दिमाग से बूढ़े लोगों से है - इसको पढ़ने का कष्ट न उठाना चाहिए; क्योंकि इसको पढ़ने से सिर्फ उनकी आँखें थकेंगी और फायदा कुछ भी न होगा।
मैं कल्पना करता हूं कि तुम्हारी उम्र अठारह-बीस वर्ष की है, तुम अपने शिक्षाकाल या विद्यार्थी-जीवन को समाप्त कर चुके हो और अब सांसारिक जीवन में प्रवेश कर रहे हो। मैं यह भी मान लेता हूं कि तुम्हारा दिमाग अंधविश्वास से, जिसे तुम्हारे शिक्षकों ने तुम्हारे भीतर भरने की कोशिश की थी, से मुक्त है! तुम नरक-स्वर्ग की बातों से नहीं डरते और तुम मुल्लाओं तथा पुजारियों की थोथी बातों को सुनने नहीं जाते। साथ ही तुम उन दिखावटी लोगों में से भी नहीं हो जो पतनशील जातियों में प्रायः पैदा हुआ करते हैं, जो अपने चमकीले कपड़ों और बंदर की सी शक्ल को मेले-तमाशों में दिखलाया करते हैं और जो छोटी उम्र किसी भी तरह सुख भोगने की बेहद लालसा रखते हैं; बल्कि मैं तो यह मानता हूं कि तुम एक सहृदय व्यक्ति हो और इसी कारण मैं तुमसे बातें करता हूं।
मैं जानता हूं कि तुम्हारे सामने अक्सर एक प्रश्न आया करता है -‘‘हमें आगे चलकर क्या बनना है?’’ वास्तव में प्रत्येक मनुष्य अपनी युवावस्था में यही समझता है कि उसने बहुत वर्षों तक समाज की सहायता के आधर पर जिस किसी विद्या या कला का अध्ययन किया है, उसका उद्देश्य यह नहीं है कि अपने ज्ञान को दूसरों को लूटने तथा अपने स्वार्थ-साधन करने का जरिया बनाया जाये। ऐसा व्यक्ति तो अवश्य ही महाभ्रष्ट है और दुर्गुणों से पूर्ण है, जिसके मन में यह कल्पना नहीं उठती कि समय आने पर मैं अपनी बुद्धिमत्ता, योग्यता और ज्ञान को उन लोगों को अधिकार दिलाने में लगाऊंगा जो आज दुर्दशा और अज्ञान में फंसे हुए हैं।
मैं मान लेता हूं कि तुम उन्हीं में से एक हो, जिनको इस प्रकार के सपने आया करते हैं। क्या वास्तव में ऐसा नहीं है? अच्छा, तो अब हमको देखना चाहिए कि अपने स्वप्न को सत्य बनाने के लिए तुमको क्या करना है!
मैं यह नहीं जानता कि तुम कैसे घर में पैदा हुए हो। संभव है, तुम किसी संपत्तिशाली घर के हो और तुमने विज्ञान के अध्ययन का विचार किया हो, तुम डाक्टर बनना चाहते हो, अथवा बैरिस्टर, लेखक या वैज्ञानिक, तुम्हारे सामने एक विशाल कार्यक्षेत्र मौजूद है और तुम विस्तीर्ण ज्ञान और सुशिक्षित बुद्धि को लेकर कार्यक्षेत्र में प्रवेश कर रहे हो अथवा इसके विपरीत, तुम एक मेहनती कारीगर हो और तुम्हारी विज्ञान-संबंधी शिक्षा स्कूल की साधरण पढ़ाई तक ही सीमित है, पर साथ ही तुमको इस बात का स्वयं अनुभव प्राप्त करने का मौका मिला है कि वर्तमान समय में श्रमजीवियों, मजदूरों को कैसी कठिन मेहनत करके गुजारा करना पड़ता है।)

1. डॉक्टर

अभी मैं पहली कल्पना पर विचार करता हूं। इसलिए मैं यह मान लेता हूं कि तुमको अच्छी वैज्ञानिक शिक्षा मिली है। मान लो कि तुम डॉक्टर बनना चाहते हो।
कल फटे-पुराने कपड़े पहने एक आदमी किसी रोगी स्त्री को देखने के लिए तुम्हें बुला ले जाता है। तुम्हें ऐसे तंग गली-कूचों में से ले जाता है, जिनमें दो आदमियों का साथ-साथ चल सकना भी कठिन है। तुम्हें एक बदबूदार जगह में टिमटिमाते दीपक की रोशनी में ऊपर चढ़ना पड़ता है। तुम दो, तीन, चार या पांच गंदे जीने चढ़कर एक अंधेरी सीलनवाली कोठरी में पहुंचते हो और वहां रोगी स्त्री को टूटी-सी चारपाई पर मैले चीथड़ों से ढ़की हुई पाते हो। पीले चेहरों वाले मैले-कुचैले बच्चे पतले कपड़ों के भीतर ठंड से कांपते हुए आँखें फाड़-फाड़ कर देख रहे हैं। स्त्री का पति उम्रभर किसी कारखाने में बारह-तेरह घंटे रोज काम करता रहा। अब वह तीन महीने से बेकार बैठा है। नौकरी छूट जाना उसके लिए कोई नई बात नहीं है। प्रायः हर साल या समय-समय पर ऐसी घटना हुआ ही करती है। पर पहले जब वह बेकार रहता था तो उसकी स्त्री कुछ मेहनत-मजूरी कर लेती थी, शायद वह तुम्हारे ही घर चौका-बर्तन करती रही हो, और पांच-सात रुपया महीना कमा लेती थी, पर अब वह भी दो महीने से बीमार है और सारा परिवार दुर्दशा के भीषण पंजे में फंसा हुआ है।
डॉक्टर साहब, आपने यह तो आते ही समझ लिया होगा कि इस स्त्री की सारी बीमारी सिर्फ शारीरिक दुर्बलता है, जिसका कारण है पौष्टिक भोजन का अभाव और स्वच्छ हवा की कमी। आप इसके लिए क्या नुस्खा तजबीजेंगे? प्रतिदिन एक सेर दूध? शहर के बाहर स्वास्थ्यकर स्थान में घूमना-फिरना? अच्छे हवादार कमरे में सोना? कैसी विडम्बना है! अगर उसके पास इतनी ही हैसियत होती, तो ये उपाय बिना आपकी सलाह के बहुत पहले कर लिये गये होते।
अगर तुममें कुछ सहृदयता का भाव है, अगर तुम खुलकर बातचीत करते हो और अगर तुम्हारे चेहरे से ईमानदारी टपकती है, तो उन लोगों से तुमको बहुत-सी बातें मालूम हो सकती हैं। वे तुमको बतलायेंगे कि बगल की कोठरी में जो औरत बुरी तरह से खाँस रही है कि जिसे सुनकर तुम्हारा कलेजा फटा जाता है, वह कपड़े साफ करनेवाली एक गरीब स्त्री है। नीचे की मंजिल में रहनेवाले सब बच्चे बुखार से पीड़ित हैं। सबसे नीचे की मंजिल में रहनेवाली धोबिन इस जाड़े के अंत तक जिंदा नहीं बचेगी। और बगल के मकान में रहनेवाले लोगों की दशा इससे भी बुरी है। इन सब बीमार लोगों से तुम क्या कहोगे? क्या उनके लिए पौष्टिक भोजन, आबोहवा की तबदीली, हलका श्रम आदि तजबीज करोगे? तुम चाहोगे अवश्य कि तुम ऐसा कर सको, पर तुम कहने का साहस नहीं कर सकते और तुम दुःखी हृदय से भाग्य को कोसते हुए वापस आते हो।
दूसरे दिन, जब अभी तुम उस नरक-कुंड में रहनेवालों के भाग्य पर विचार ही कर रहे हो, तुम्हारा साथी तुमको बतलाता है कि कल एक दरबान उसको बुलाने आया था और साथ में गाड़ी भी लाया था। वह उसे सुन्दर महल में रहनेवाली एक श्रीमती को देखने को ले गया। उस रमणी को रात में नींद न आने की बीमारी है। उसने अपना सारा जीवन बनाव-सिंगार, दावतों, तमाशों और अपने बेवकूफ पति के साथ दांता-किलकिल करने में बिताया है। तुम्हारे मित्र ने उसके लिए तजबीज किया - यथासंभव कृत्रिम आदतों का त्याग करना, सादा भोजन, स्वच्छ हवा में टहलना, शांत स्वभाव रखना और कोई शारीरिक काम न करने की कमी को किसी अंश में पूरा करने के लिए अपने कमरे के भीतर हलकी कसरत कर लेना।
एक इसलिए मर रही है कि उसे तमाम उम्र न कभी काफी खाना मिला, न काफी आराम, दूसरी इसलिए तकलीफ पा रही है कि उसे अपने जीवन में आज तक यही मालूम नहीं हुआ कि मेहनत करना किसे कहते हैं!
अगर तुम उन निर्बल चरित्र के व्यक्तियों में से हो, जो हर तरह की परिस्थिति से दब जाते हैं, जो अत्यंत वीभत्स दृश्य को देखकर भी एक शोक-सूचक निःश्वास तथा शर्बत के एक गिलास से चित्त को शांत कर लेते हैं, तो धीरे-धीरे तुमको इन परस्पर विरोधी दृश्यों को देखने की आदत हो जायेगी। तुम्हारे भीतर पशुभाव उदय होने लगेगा। तुम्हारा एकमात्र उद्देश्य सुख-लोलुप लोगों के बीच में रहना बन जायेगा, जिससे तुमको कभी दुर्दशाग्रस्त लोगों के बीच में जाने का काम ही न पड़े। पर अगर तुम ‘आदमी’ हो, अगर तुम अपने मनोभावों को कार्य में परिणत करने की इच्छाशक्ति रखते हो, अगर तुम्हारे पशुभाव ने तुम्हारे विवेक को नष्ट-भ्रष्ट नहीं कर दिया है, तो एक दिन तुम अपने मन में यह कहते हुए घर लौटोगे - ‘‘नहीं, यह अन्याय है, यह अधिक समय तक कायम नहीं रहना चाहिए। केवल रोगों का इलाज करने से काम नहीं चलेगा, उनके पैदा होने के कारणों को ही रोकना चाहिए।’’ अगर मनुष्यों को भोजन-वस्त्र की कुछ सुविधा हो जाये और वे कुछ शिक्षित हो जायें तो हमारे रोगियों की संख्या आधी रह जाये और बीमारियां भी लुप्त हो जायें। चिकित्सा-शास्त्र चूल्हे में जाये! स्वच्छ हवा, पौष्टिक भोजन और साधारण परिश्रम - यही सबसे पहली बातें हैं। इनके बिना सब बातें चालबाजी और धेखेबाजी के सिवा और कुछ नहीं हैं।
बस, जिस दिन ये बातें तुम्हारी समझ में आ जायेंगी, उसी दिन तुम साम्यवाद को समझ जाओगे। फिर तुम इसको पूरी तरह से जानना चाहोगे। और अगर तुम परोपकार के सिद्धांत के महत्त्व को कुछ भी समझते हो, अगर तुम एक स्वाभाविक दार्शनिक की भांति प्रमाणों के साथ सामाजिक प्रश्नों पर विचार करोगे तो अंत में एक दिन तुमको साम्यवादियों के दल में मिल जाना पड़ेगा और तुम सामाजिक क्रांति के लिए उद्योग करने लगोगे। 

2. वैज्ञानिक


अब हम दूसरी कल्पना पर विचार करते हैं । मान लो तुम डॉक्टर न बनकर एक वैज्ञानिक बनना चाहते हो, और खगोल विद्या, प्राणीशास्त्र या रसायन शास्त्र में लगकर विज्ञान की उन्नति करना चाहते हो। ऐसे काम का फल सदा अच्छा निकलेगा, भले ही वह हमें न मिलकर आनेवाली पीढ़ियों को मिले।
सबसे पहले हमें यह जानने का उद्योग करना चाहिए कि विज्ञान की उन्नति करने से तुम्हारा उद्देश्य क्या है? क्या यह उद्देश्य केवल आनन्द, उत्कृष्ट आनन्द प्राप्त करना है, जो प्रकृति के निरीक्षण और अपनी मानसिक शक्तियों को किसी काम में लगाकर विकसित करने से मिलता है। उस दशा में मैं तुमसे पूछूंगा कि जो दार्शनिक अपना जीवन आनन्द के साथ व्यतीत करने के लिए विज्ञान का अध्ययन करता है, उसमें और एक शराबी में, जो शराब के नशे में थोड़ी देर के लिए दिल की खुशी हासिल करता है, क्या फर्क है? इसमें सन्देह नहीं कि दार्शनिक ने अपने आनन्द का विषय अधिक बुद्धिमानी से चुना है, क्योंकि उससे शराब की अपेक्षा बहुत गहरा और बहुत स्थायी आनन्द मिलता है, पर इससे ज्यादा कुछ नहीं। दोनों ही व्यक्ति स्वार्थ पर निगाह रखते हैं और दोनों का उद्देश्य एक ही है, यानि व्यक्तिगत सुख प्राप्त करना।
पर नहीं, तुम कहोगे कि मैं अपने स्वार्थ के लिए यह काम नहीं करता, विज्ञान की उन्नति के लिए, मनुष्य जाति के हित के लिए करता हूं। मेरे अन्वेषण का यही लक्ष्य रहेगा।
यह भी मजेदार भ्रम है । हमारे में से जिस किसी ने भी जब पहले-पहल विज्ञान का कार्य आरम्भ किया था तो अवश्य ही एक बार इसका सहारा लिया था। पहले हम भी ऐसा ही करते थे।
पर यदि दरअसल तुम मानव-जाति का विचार करते हो और तुम्हारा उद्देश्य मानव-समाज का हित-साधन करना है, तो तुम्हारे सामने एक विकट प्रश्न उपस्थित होता है। तुम्हारे भीतर समालोचना करने का भाव कितना ही कम क्यों न हो, तो भी तुम तुरंत जान सकते हो कि आजकल हमारे समाज में विज्ञान सुखोपभोग का एक साधन-मात्र बन गया है, जिससे थोड़े से लोग अपने जीवन को अधिक सुखी बनाते हैं, पर मानव-समाज का अधिकांश भाग उस तक पहुंच भी नहीं पाता।
सौ साल से ज्यादा समय व्यतीत हो गया, जब विज्ञान ने विश्व ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति का निश्चयात्मक रूप से निर्णय कर दिया था; पर कितने लोगों ने उन सिद्धांतों का अध्ययन किया है, या उस संबंध में कुछ वैज्ञानिक और आलोचनात्मक ज्ञान रखते हैं? ऐसे लोगों की संख्या शायद कुछ हजार होगी, पर उन करोड़ों मनुष्यों के सामने, जो अभी तक दुराग्रह और अंधविश्वासों में फंसे हैं और इस कारण धर्मिक ठगों के हाथों में कठपुतली बन जाते हैं, ऐसे लोगों की संख्या दाल में नमक के बराबर भी नहीं है।
अगर हम इससे कुछ और आगे बढ़कर देखें तो हमें विचार करना चाहिए कि विज्ञान ने शारीरिक और चरित्र संबंधी स्वास्थ्य के ज्ञान को फैलाने के लिए क्या किया है? विज्ञान हमें बतलाता है कि अपने शरीर का स्वास्थ्य कायम रखने के लिए हमें किस तरह रहना चाहिए और किस तरह देश में बसने वाली असंख्य जनता अच्छी दशा में रखी जा सकती है। पर क्या इन दोनों बातों के लिए किया गया परिश्रम केवल किताबों में बन्द रहकर बेकार नहीं पड़ा है? सब लोग जानते हैं कि यह परिश्रम बेकार पड़ा है। इसका कारण क्या है? यही कि विज्ञान का अस्तित्व आजकल केवल थोड़े से विशेष अधिकार-प्राप्त लोगों के वास्ते है। सामाजिक असमानता के कारण आजकल मानव-जाति दो भागों में बंटी हुई है - एक मजदूरी करने वाले गुलाम और दूसरे धन-सम्पत्ति के स्वामी, पूंजीपति। इस भेद के कारण विवेकयुक्त जीवन व्यतीत करने की सब शिक्षाएं सौ में से नब्बे मनुष्यों के लिए एक दिल दुखाने वाले मजाक के सिवा और कुछ अर्थ नहीं रखतीं।
मैं तुम्हें और भी बहुत से उदाहरण बता सकता हूं, पर बात को ज्यादा बढ़ाना ठीक नहीं। अगर तुम अपनी तंग कोठरी से, जिसकी खिड़कियों पर धूल जमी हुई है और जिसमें रखी हुई पुस्तकों की अलमारियों पर सूर्य का प्रकाश भी नहीं पड़ता, बाहर निकलकर चारों तरफ आँखें खोलकर देखोगे, तो तुम्हें कदम-2 पर नये प्रमाण मिलेंगे, जिनसे इस मत का समर्थन होगा।
इस समय हमें विज्ञान-संबंधी ज्ञान और अविष्कारों की वृद्धि करने की जरूरत नहीं है। सबसे जरूरी बात यह है कि जो ज्ञान अभी तक प्राप्त हो चुका है, वह प्रतिदिन के जीवन में काम में लाया जाये और सर्वसाधारण तक पहुंचाया जाये। हमें ऐसा बन्दोबस्त करना चाहिए कि सभी मनुष्य विज्ञान के सच्चे सिद्धांतों को जान सकें और काम में ला सकें। ऐसा होने से विज्ञान एक शौक की चीज न रहेगा, बल्कि मनुष्य के जीवन का आधार बन जायेगा। यही न्यायानुकूल बात है, इन्साफ का यही तकाजा है ।
इसके सिवा विज्ञान के हित की दृष्टि से भी यही आवश्यक है। विज्ञान की सच्ची उन्नति तभी होती है जब जनसमूह उसके सिद्धांतों का स्वागत करने को तैयार हो। यंत्र द्वारा उष्णता की उत्पत्ति का सिद्धांत गत शताब्दी में स्थिर हो चुका था, पर अस्सी वर्ष तक किताबों में ही बंद पड़ा रहा और उसका उपयोग तभी हो सका, जब जनता में भौतिकशास्त्र का काफी ज्ञान फैल गया। डार्विन ने प्राणियों के विकास का जो सिद्धांत मालूम किया, वह तीन पुश्त के बाद विद्वानों द्वारा स्वीकार किया गया। और वह भी तब, जब उन पर सार्वजनिक मत का दबाव पड़ा। कवि और चित्राकार की तरह दार्शनिक के अस्तित्व का आधार भी वह समाज है, जिसमें वह रहता है और अपने उपदेशों का प्रचार करता है।
पर जब इस प्रकार के विचार तुम्हारे भीतर भर जायेंगे तो तुम समझ जाओगे कि सबसे अधिक महत्व की बात वर्तमान स्थिति में जड़मूल से परिवर्तन करना है। उस स्थिति में जिसके कारण थोड़े से दार्शनिकों के भीतर वैज्ञानिक सिद्धांत ठूंस-ठूंस कर भर दिये जाते हैं और शेष जनसमूह उसी दशा में पड़ा रहता है, जिसमें वह हजार-पांच सौ वर्ष पहले था, अर्थात वह गुलामों या निर्जीव मशीनों की भांति बना रहता है और सच्चे सिद्धांतों को समझने में असमर्थ रहता है। जिस दिन तुम इस विस्तृत, गंभीर, उदार और पूर्ण वैज्ञानिक सच्चाई को पूरी तरह से समझ जाओगे, उसी दिन से तुम्हें खाली विज्ञान में कुछ मजा न आयेगा। तुम उन उपायों को जानने के लिए उद्योग करने लगोगे, जिनसे ऐसा परिवर्तन हो सकें। और अगर तुम इस जांच को उसी निष्पक्षता के साथ करोगे, जिसकी सहायता से अब तक वैज्ञानिक अन्वेषणों को करते रहे हो, तो तुम अवश्य ही साम्यवाद के पक्ष को स्वीकार कर लोगे, दिखावे और भ्रमपूर्ण तर्कों को त्याग कर साम्यवादियों के साथी बन जाओगे। तब उन थोड़े से लोगों के लिए, जिनके पास अब भी ऐसे साधनों का बहुत बड़ा हिस्सा मौजूद है, आनन्द के साधन जुटाने का उद्योग करना व्यर्थ समझकर, तुम अपने ज्ञान और शक्ति को अत्याचार-पीड़ितों की सेवा में लगाओगे।
यह विश्वास रखो कि जब तुम्हारे अन्दर कर्त्तव्य-पालन का भाव पैदा हो जायेगा और तुम्हारे विचारों और कार्यों में सच्ची एकता कायम हो जायेगी, तो तुम्हें अपने भीतर ऐसी शक्तियां मालूम होने लगेंगी, जिनके अस्तित्व का तुम्हें पहले स्वप्न में भी पता न था। अन्त में एक दिन ऐसा आयेगा - और शीघ्र ही आयेगा, चाहे उस समय तक हमारे वर्तमान शिक्षक भले ही जीवित न रहें - जब कि वह परिवर्तन, जिसके लिए तुम उद्योग कर रहे हो, उत्पन्न हो जायेगा। उस समय जनसमूह के सम्मिलित विज्ञान-सम्बंधी कार्य से नई शक्ति प्राप्त के, श्रमजीवियों (मजदूरों) के बड़े-बड़े सेना दलों की, जो अपने उद्योग का फल संसार की ज्ञान-वृद्धि में लगाएंगे, शक्तिशाली सहायता से विज्ञान और कला-कौशल इतनी शीघ्रता से उन्नति करने लगेगा, जिसके मुकाबले में उसकी वर्तमान समय की मंद गति बच्चों के खेल के समान जान पड़ेगी। तब तुम्हें विज्ञान का मजा मालूम होगा, क्योंकि उस समय आनन्द का उपभोग तुम अकेले ही न करोगे, बल्कि तुम्हारे साथ साधारण जनता भी होगी। 


 संदर्भ -: नवयुवकों से दो बातें, अभियान प्रकाशन


Friday, 7 August 2020

कविताएं




वरवर राव के लिए-2

(प्रो. वरवरा राव व तमाम राजनीतिक बंदियों की रिहाई की मांग करते हुए हमने पहले भी प्रो. वरवरा राव के लिए लिखी गई कविताओं को प्रकाशित किया है। आज फिर से इस दौरान प्रो. वरवरा राव के पक्ष में लिखी गई 11 कविताओं को हम प्रकाशित कर रहे हैं। सभी कविताएं फेसबुक से साभार ली गई हैं। - संपादक मंडल)

1. वरवर राव के लिए

वो कविताओं में उतर कर
क्रांति के बीज बोता है,
वो कविता लिखता भर नहीं
उसे जीता भी है,
कविता के स्वप्न को
जमीन पर बोता भी है
वो सिर्फ कवि नहीं
क्रांतिकारी कवि है।

कहते हैं
कवि कैद हो सकता है
कविता आज़ाद होती है,
कवि मर जाता है
कविता ज़िंदा रहती है
और समय के दिलों में धड़कती रहती है।
लेकिन वह सिर्फ कवि नहीं है
कविता बन चुका है।
कविता बन समय के दिलों में धड़क रहा है।

गौर से देखो
सत्ता के निशाने पर
सिर्फ कवि नहीं
कविता भी है।
जेल के भीतर ही कविता की 
हत्या की सुपारी दी जा चुकी है
समय का दिल खतरे में है।
ऐसे समय से निकलने की राह
उसने ही बताई है -
'कविता सिर्फ लिखो मत
उसे जिअो भी,
कविता के स्वप्न को
जमीन पर बोओ भी,
कविता में उतर
क्रांति के बीज को बोओ भी।'

                                     (-सीमा आज़ाद)


2. कवि और सरकारें

1.
सरकारें नंगी-भूखी प्रजा से नहीं डरतीं 
सरकारें खा-खाकर तोंद फुलाए सेठों से भी नहीं डरतीं
सरकारें पढ़े लिखे नौजवान अफसरों से नहीं डरतीं
सरकारें पुलिस, कचहरी, न्यायाधीशों से नहीं डरतीं
सरकारें पाकिस्तान-चीन की सेनाओं से नहीं डरतीं
सरकारें करोड़ों करोड़ बेरोजगार युवाओं से नहीं डरतीं 
लेकिन सरकारें डर जाती हैं कवियों से।

सरकारें क्यों डर जाती हैं कवियों से?
वो तो सिर्फ गरीबों के दुःख लिखता है पन्नों पर
वो तो सिर्फ भूखे नंगों के चित्र बनाता है शब्दों से
वो तो सिर्फ शोषण की दास्तान सुनाता है समय को
वो तो धरना प्रदर्शन जुलूस भी नहीं निकालता
सरकारों के ख़िलाफ़
फिर भी सरकारें डर जाती हैं कवियों से
सरकारें क्यों डर जाती हैं कवियों से?

जेलों में यातना सहता
80 साल का वृद्ध कवि मुस्कुराता है
सरकारें डर जाती हैं
अपने बच्चों के दुखों से बेपरवाह
कवि गुनगुनाता है कुछ शब्द
सरकारें डर जाती हैं.
सरकारें क्यों डर जाती हैं कवियों से?

2.
सरकारें सदियों से डरती रही हैं कवियों से
इसीलिये सरकारों ने बनाई हैं साहित्य अकादमियां 
कवि आवार्ड के लिए दिल्ली तक पहुँच जाते हैं
कवि फिर दुःख के गीत नहीं गाते
राजाओं की लीलाओं के नयनाभिराम चित्र उकेरते हैं 
कवि जीवन के सौन्दर्य बखानते हैं
कला के गीत गाते हैं
राजाओं की अगवानी में शब्दों के हार बनाते हैं कवि
कवि रानियों के लिए प्रेम गीत लिखते हैं
उनके बच्चों के लिए लोरियां गाते हैं
उनके भाषणों में जनता के लिए राहतों के शब्द लिखते हैं कवि।

फिर वो कौन कवि है
जो अब भी गरीबों-शोषितों-पीड़ितों के दुःख लिख रहा है
अपनी कविताओं में?

                                     
                                                 (-धनंजय कुमार, मुम्बई)




3. अगर तुम कायर नहीं हो तो

कवि जेल में बंद है
क्योंकि
कवि से सरकार डरती है
उसे रिहा करने से हिल जाती है
सरकार की दुनिया
कवि बूढ़ा हो या हो बीमार तो भी
उसकी हुंकार से
सरकार सिहरती है!

कवि के शब्द तुम्हारी कैद में नहीं आने वाले 
कवि के कथन तुमको सदियों सोने न देंगे 
कवि के विचार तुम्हारे विरुद्ध युद्ध के लिए
निमंत्रित करेंगे कोटि-कोटि जन को
कवि के शब्द बेधते रहेंगे
तुम्हारे कुटिल तंत्र को!

एक कवि को तुम मार सकते हो
लेकिन उसकी मौत भी कविता बन
तुम्हारे पराभव के गीत गाएगी
उसकी कविता को
तुम्हारी जेल भी कैद नहीं कर पाएगी!

उसके शब्द षड्यंत्र हैं तुम्हारे लिए
उसके विचार विद्रोह हैं तुम्हारे लिए!
उसका जीवन विद्रोह है!

विरुद्ध कवियों कि कतार बढ़ती जा रही है
विरुद्ध कविता तुम्हारे अंत के गीत गा रही है!

वरवरा राव को रिहा करो!
अगर तुम कायर नहीं हो तो!

                                            
                                                          (-बोधिसत्व, मुंबई)


4. कवि का पक्ष और संघर्ष

जहर का प्याला
और सच 

ज़िन्दगी  का गीत
और  दंड

मौत का खौफ
और लक्ष्य

कवि का पक्ष
और संघर्ष

लाल सलाम का नारा
और भींचे मुट्ठी ताने वरवर ....!

'सिले होठों के सेनापति'
आँखो से  कभी
ओझल नहीं होते ...!


                                             (-देवेंद्र कुमार)



5. डर


क्या आप जानते है
डर किसे कहते हैं?
जब हमारे कवि ने
कविता लिखी
और कविता से ही
उखड़ने लगे सत्ता के पोल
तब हमने देखा
सत्ता में डर
और उन्होंने उन्हें पकड़ने का
कर दिया फरमान जारी।

जब हमारे कवि ने
जेल जाकर भी
मुस्कराना नहीं छोड़ा
तब वे डरे
इतना डरे
कि उन्हें
नहीं दिया बेल
वे इतना डरे
कि बेल के नाम से ही
थर्र थर्र कांपने लगे।

जब जेल में रहकर भी
हमारे कवि
हमारे दिलों तक पहुंच गए
और बाहर के आबोहवा में
तैरने लगी उनकी कविता
जब उस कवि और कविता के लिए
उठने लगी आवाज
वे और डरे
बढ़ा दिया पहरा इतना
कि न बाहर की हवा
अंदर जा सके
न अंदर की बाहर
और संपर्कविहीन रहे
अंदर बाहर की दुनिया ।।

वे आज भी डरे हुए है
बेहद डरे हुए
जहाँ कोरोना के नाम पर
पैरोल पर कैदियों को
छोड़ने की निकली नोटिस
विचाराधीन और जनकवि
और अस्सी साल के वृद्ध
होने के बावजूद
बढ़ाए गये उनके पहरे 
कोराना के डर की संभावना की
अपील भी कर दी गयी रद्द
और एक दिन
उनके ही पहरे के अंदर
उनकी लापरवाही को
उजागर करती महामारी ने
जकड़ लिया उन्हें
तब बेहद खराब अवस्था में
पहुंचा दिया गया उनका स्वास्थ्य
एक बेशर्म व्यवस्था के तहत ।।

वे इतने डरे  कि
तब भी नहीं करते
इलाज का उचित बंदोबस्त
उनके इसी तरह
मार डालने की
साजिश के साथ।।

उनके जिंदा रहने का खतरा
उन्हें वैसा ही हो रहा महसूस
जैसे चंद्रशेखर आजाद ,
भगत सिंह...
की जिंदगी से
अंग्रेज को हुआ था।।

आज बेहद खराब हालात पर भी
वे उनके इलाज से
कन्नी काटना चाहते हैं
क्योंकि वे बेहद डरे हुए है 
जब कवि लिखता है
मैंने बम नहीं बांटे
वे और भी डर जाते है

आज यदि हम कह दें उन्हें
नालायक अब क्या डरते हो
इस अवस्था में पहुंचाकर
कि उन्हें अपना सुध भी नहीं
तो हमारा यह कहना गलत होगा
सच याद तो रखनी है
कि वे एक जनकवि है
और उनके साथ
इस अवस्था में
पहुंचाने वाले से
जनता एक दिन
अपना हिसाब जरूर करेंगी।।

जब वे डरते है इस बात से
कि कवि ने बम नहीं बांटे
तो उनका डर सच है
वे भी जानते है
बम को डिफ्यूज
किया जा सकता है
क्रांतिकारी  विचार को
डिफ्यूज करना
कठिन ही नहीं
नामुमकिन है   ।।


                             (-इलिका प्रिय)



6. उसकी बराबर वाली कोठरी में एक बूढा कवि बंद है


जंगल में अभी भी उतनी ही हरियाली है
घने जंगल में अभी अभी बारिश बंद हुई है
अभी भी पत्तों से बूंदें टपक रही हैं
जंगल के बीच बसे गाँव में मिट्टी के खपरे वाले घर से अभी भी धुआं निकल रहा है
घर के सामने छोटा बच्चा अभी भी खेल रहा है
भात पकने के बाद बच्चे को मिलेगा यह उम्मीद अभी भी बाकी है

उधर बहुत बड़े शहर में एक अडानी इस जंगल का सौदा कर रहा है
उसके सूटकेस में कागज के नोटों के बंडल हैं
एमएलए और मंत्री लार टपका रहे हैं

उधर दिल्ली में दो खूनी बैठ कर अडानी के पाँव दबा रहे हैं
इधर एक जख्मी औरत अडानी को रोकने के लिए पूरी ताकत लगा रही है
इधर वर्दी पहने एक कानून का रखवाला अडानी के लिए उस औरत को मारने की योजना बना रहा है

उधर दूर किसी जेल में एक कानून जानने वाली औरत बंद है
उसकी बराबर वाली कोठरी में एक बूढा कवि बंद है
उससे अगली कोठरी में जनता को प्यार करने के जुर्म में शरीक कई सारे लोग जमीन पर लेटे हुए हैं
एक मास्टर भी जमीन पर घिसट रहा है क्योंकि उसके पाँव बेजान हो चुके हैं
एक वर्दी वाला जो दोनों खूनियों की खूनी की कहानी जानता है वह भी उदास बैठा है

शहर में लोग अपने बनाए हुए पकोड़ों के फोटो शेयर कर रहे हैं

इधर जंगल में लोग भात की पतीली बचाने के लिए अपनी लड़ाई लड़ने की योजना बना रहे हैं

कुछ लोग सातवें आसमान में बैठे किसी ईश्वर का इन्तजार कर रहे हैं

कुछ लोग इसे बदलने की कोशिश कर रहे हैं


                                                                             (-हिमांशु कुमार)



7. मैं सत्ता से कवि की मुक्ति की मांग को खारिज करता हूं!


(कैद कवि वरवर राव के लिए)
मेरे पास कोई कविता नहीं जिससे
एक कवि को कैद से छुड़ा लाऊं
मेरे पास ऐसे कोई शब्द नहीं जिनसे
मैं रोटी बना पाऊं
या कोटि कोटि जन के
दुःख मिटाने वाले मंत्र बना पाऊं
मेरे पास ऐसे कोई अक्षर नहीं जिससे मैं
एक विलाप को गायन में बदल पाऊं!

कवि को कैद में रहने दो?
भूख को बने रहने दो?
विलाप को गायन क्यों बनाना?
दुःख मिटाने के लिए उठाओ शब्द नहीं कुछ और
कुछ और कुछ और!

मैं कविता शब्द और
अक्षर के दुःख और सुख जानता हूं
मैं कवि की कैद को कविता की जय मानता हूं
वे हथकड़ियां पराजित हैं
जो कवि को बंधक बनाया करती हैं

सृष्टि में भूख और रुलाई
सत्ता के मृत होने के संकेत हैं
हर आंसू शासक की मृत्यु है
हर यातना हर क्रूरता!

एक उदास तिनका यदि इच्छा के विपरीत जलाया जाए तो यह अग्नि की क्रूरता है!
एक उदास अक्षर एक शब्द यदि एक अपनी इच्छा के विपरित प्रशस्ति पत्र में जोड़ा जाए तो यह
संसार के हर शब्द की पराजय है!

यह एकदम जरूरी नहीं कि सत्ता अपनी पराजय की घोषणा करे स्वयं
वह अपनी हार की मुनादी करे और बताए कि वह हार चुकी है लोगों!
यह एकदम जरूरी नहीं कि वह एक कवि से भी स्वीकार करे अपनी हार?

हारी हुई सत्ता
आंसू की बूंदों में अपने प्रतिबिंब देख कर डरती है
हर पराजित राज्य भूख को भूल जाने के मंत्र खोज लेने की मुनादी करता ही है बार बार!

लेकिन वह हर आंसू के साथ मरता ही है!

मैं कवि को रिहा करने की मांग नहीं करता
किसी तानाशाह से
किसी सत्ता से कुछ भी मांगना
मुझे स्वीकार नहीं!

वह जो दे सकता है वह दे चुका है कवि को
वह जो दे सकता है दे रहा है विदूषक!

उससे पाने कि उम्मीद भी क्यों?
उससे मुक्ति की बात करो
उससे क्यों छुड़ाना कवि को याचना करके?
उससे आंसू और यातना के नए अर्थ क्यों पूछना?

कवि कैद में है
यह याद रहे तो भी सत्ता की पराजय है
कवि से सत्ता परेशान है यह याद रखना भी
कविता की जीत है!

उस इमारत को देखो
उसमें कवि नहीं
एक पराजित सत्ता कैद है
उस कवि को याद रखो
उसकी कविता को मंत्र बनाओ
आओ लोगों सत्ता को याद दिलाओ
कि एक बीमार कवि की कैद में है
एक पूरी सत्ता!

मेरे पास कोई कविता नहीं
जिससे कवि की रिहाई संभव हो
मैं ऐसे शब्द और अक्षर हीन हूं
मैं सत्ता से कवि की मुक्ति की मांग को खारिज करता हूं!


                                                      (-बोधिसत्व, मुंबई)



8. वे भयग्रस्त हैं किताबों से


किताबों में
न कोई बम है
न कोई पिस्तौल
और न तेज धार वाला कोई चाकू
फिर भी
वे भयभीत हैं
उन किताबों से
जिनमें सपने हैं
बहुसंख्यक जन की आजादी और खुशी के
और जो
ऐसे सपनों को पूरा करने का
बताती हैं रास्ता...
इसीलिए
उन्हें तलाश है
इन्हें लोगों तक पहुँचाने वालों
पढ़ने वालों
सपने देखने वालों
और सपनों को सच में बदलने के लिए संकल्पबद्ध
सिरफिरों की...
लेकिन
उन्हें कुचल देने की तमाम कोशिशों के बावजूद
छोटे पड़ जा रहे हैं उनके हाथ
और दिन प्रतिदिन
बढ़ती ही चली जा रही है तादाद
सपने देखने वालों की
और उन्हें सच में बदलने वालों की...


                                                                    (-हितेश संगीता शांतिलाल)


9. वरवर राव


वरवर राव का कलम तोड़ने की
कई कोशिशें की जुल्मत के तख्तनशीनों ने
हर बार और ही निखरती गई उसकी आवाज

बंद करते हो उन्हें बार बार
कलम की जगह बंदूक उठाने के आरोप में
क्योंकि तुम डरते हो उनके कलम से गढ़ी कविता की धार से

क्योंकि लिखता है उनका कलम सदा ही सदाकत
होने से कमजोर दिमाग की आंखें
तुम्हें सदाकत में दिखती है जुल्म के मातों की बगावत

कलम जब्त कर उसे बंदूक बना देते हो
सशस्त्र तख्ता पलट का मुकदा लाद देते हो
मार भी डालोगे यदि वरवर राव को

आवाम पर आजमाई अपनी  बर्बरता से
कलम लिखता रहेगा सदाकत के तराने
आवाम की जंगे आजादी के गाने

हरावल दस्ता बन जाएगी कविता
निकल पड़ेगा जो ले मशालें शब्दों का
चकनाचूर कर देगा
धनपशुओं की खिदमत में
मुल्क को गुलाम बनाए रखने का तुम्हारा मंसूबा

तोड़ देगा समाज को टुकड़े-टुकड़े करने का तुम्हारा इरादा
जाति-धर्म के नाम पर

बनी रहेगी शब्दों के मशालों की निरंतरता
जुल्मतों के तुम्हारे निजाम के खात्मे तक
चप्पे चप्पे में इंकलाब के नारे गूंजने तक
इंकलाब जिंदाबाद
जिंदाबाद जिंदाबाद।



                                                (-ईश मिश्रा)



10. इंकलाबी कवि


इंकलाबी कवि होने के लिये 
यह ज़रूरी नहीं होता कि आप कितने वजनदार ,
कितने सख्त, कितने सुन्दर उपमा, अलंकारो से भरे हुए लिखे,
इंकलाबी कवि होने के लिये यह ज़रूरी है कि 
आपने जो लिखा उसके लिये आपने खुद कितना सहा .....
कितना किया ......
इंकलाब सिर्फ कविता नहीं .
सो इंकलाबी कवि भी कैसे सिर्फ 
कविता से कोई हो सकता है ..... ..


                                                      (-देवेंद्र कुमार)


11. क़ैद में कवि 


कहाँ कैद कर पायीं हैं एक कवि को 
जेल की सलाखें 

सरकारें उसे कैद करती हैं 
वह भाषा का हथियार भाँजते हुए निकल आता है 
अपनी देह के बाहर 
और किसी पूर्व चेतावनी की तरह 
फैल जाता है जनता के हृदयों में 

सरकारें कैद करती हैं
कवि बड़ा हो जाता है 
सरकारें हत्या करती हैं
कवि और बड़ा हो जाता है 

मूर्ख सरकारें एक देह को कैद करती हैं 
और सोचती हैं कवि को कैद कर लिया 

भला कौन बाँध पाया है पानी 
भला कौन भेद पाया है दिशाएँ 
भला कहाँ कैद कर पायीं हैं कवि को 
जेल की सलाखें । 


                                                  (-विहाग वैभव)

Tuesday, 4 August 2020

सांप्रदायिकता पर विशेष--मिथक बनाम



सांप्रदायिकता पर विशेष


मिथक बनाम असलियत


(‘‘हम बच्चे पैदा करने के लिए राहत-शिविर नहीं चला सकते........, वे बच्चे पैदा कर करके लंबी लाइनें लगा रहे हैं जो यहां-वहां साइकिलों के पंचर लगाते फिरते हैं..........., हम परिवार नियोजन की तरफ बढ़ रहे हैं, जबकि उनका मकसद है : हम पांच, हमारे पच्चीस......, जो लोग इस तरह फैलते जा रहे हैं, हमें उन्हें सबक सिखाना होगा........।’’ प्रस्तुत लेख संघ परिवार द्वारा मुसलमानों पर लगाए जा रहे ऐसे ही आरोपों को तथ्यों की कसौटी पर जांचने का प्रयास करता है । इस लेख में दिया गया कोई तथ्य यदि आपको गलत लगे तो कृपया हमें जरूर सूचित करें, ताकि जनता में सिर्फ सच ही जाए।    -संपादक मंडल)


भारत में हिन्दू-मुसलमानों को एक साथ रहते लगभग 1200 वर्ष हो चुके हैं । इन 1200 वर्षों में ज्यादातर समय हिन्दू और मुसलमान आपसी सद्भाव और भाईचारे की भावना के साथ ही रहे हैं । हिन्दू और मुस्लिम दंगों का इतिहास लगभग 1920 के दशक से शुरू होता है । परिणामस्वरूप पिछले 80 वर्षों में हिन्दू और मुसलमान दो अलग-अलग समुदायों, दो अलग-अलग द्वीपों की तरह बन गए जो एक ही क्षेत्र में रहते हुए भी एक दूसरे की संस्कृति, मानसिकता और विचारों से हजारों मील के फासले पर बैठे नजर आते हैं । हिटलर के प्रचार मंत्री गोयबल्स का सिद्धांत था कि एक झूठ को अगर सौ बार बोल दिया जाए तो वह सच बन जाता है । भारत में भी ऐसे अनेक झूठ विभिन्न धर्मों के ठेकेदारों द्वारा जोर-शोर से प्रचारित किये जाते हैं । आम हिन्दुओं में मुसलमानों के बारे में अनेक भ्रान्तियां मौजूद हैं, जिनका फायदा हिन्दू कट्टरपंथी ताकतें उन्हें बरगलाने के लिए उठाती हैं । इस लेख में ऐसी ही कुछ भ्रान्तियों के बारे में बात की गई है । हम आशा करते हैं कि पाठकगण अपने पूर्वाग्रहों को छोड़कर इन तथ्यों पर एक बार अवश्य चिन्तन करेंगे और ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ के आदर्श सूत्र के साथ मानवता की सेवा के लिए आगे बढ़ेंगे ।

1. मिथक :-

मुसलमानों की जनसंख्या ज्यादा रफ्तार से बढ़ रही है और वे शीघ्र ही हिन्दुओं से ज्यादा हो जायेंगे ।

असलियत :- 

यह एक ऐसा मिथक है जिस पर लगभग हर हिन्दू यकीन करता है । संघ परिवार इस मिथक का इस्तेमाल हिन्दुओं के मन में एक डर पैदा करने के लिए खूब करता है कि इस रफ्तार से बढ़ते हुए मुसलमान जल्दी ही हिन्दुओं से ज्यादा हो जायेंगे और वे भारत को एक मुस्लिम देश बना देंगे।

सबसे पहले देखें कि इस बारे में जनगणना के आंकड़े क्या बोलते हैं-:

वर्ष - 1961
कुल जनसंख्या - 43.9 करोड़
कुल हिन्दू आबादी - 83.4%
कुल मुस्लिम आबादी - 10.5%

वर्ष - 1971
कुल जनसंख्या - 54.8 करोड़
कुल हिन्दू आबादी - 82.7%
कुल मुस्लिम आबादी - 11.2%

वर्ष - 1981
कुल जनसंख्या - 68.5 करोड़
कुल हिन्दू आबादी - 82.4%
कुल मुस्लिम आबादी - 11.7%

वर्ष - 1991
कुल जनसंख्या - 85.6 करोड़
कुल हिन्दू आबादी - 82.0%
कुल मुस्लिम आबादी - 12.2%

वर्ष - 2001
कुल जनसंख्या - 107.5करोड़
कुल हिन्दू आबादी - 80.5%
कुल मुस्लिम आबादी - 13.4%

वर्ष - 2011
कुल जनसंख्या - 125.3 करोड़
कुल हिन्दू आबादी - 79.8%
कुल मुस्लिम आबादी - 14.23%
 
(स्त्रोत : आंकड़े सरकारी जनगणना से लिए गए हैं।)

उपरोक्त आंकड़े बोल रहे हैं कि पिछले 50 वर्षों में हिन्दुओं की आबादी के प्रतिशत में थोड़ी ही कमी आई है और मुसलमानों की आबादी में थोड़ी ही वृद्धि। अगर यही रफ्तार रही तो मुसलमानों की आबादी को हिन्दुओं की आबादी के बराबर पहुंचने में 3626 साल लग जायेंगे। लेकिन समाज शास्त्रियों के अनुसार उससे कहीं पहले (शायद अगले 100 वर्षों में ही) जनसंख्या वृद्धि रुक जायेगी।
स्पष्ट है कि न तो मुसलमानों की आबादी 60 वर्षों में बढ़कर 40 प्रतिशत हो गयी है (जैसा कि संघ के प्रचारक दावा करते हैं) और न ही कभी भारत में उसकी सम्भावना है।
समाज शास्त्री बताते हैं कि जनसंख्या वृद्धि का कारण सामाजिक, आर्थिक परिस्थितियां होती हैं । 50 और 60 के दशक में भारत में ईसाइयों की जनसंख्या अपेक्षाकृत ज्यादा रफ्तार से बढ़ी थी क्योंकि बेहतर स्वास्थ्य व शिक्षा सुविधाओं के चलते उनकी मृत्युदर कम हो गयी लेकिन जन्मदर उतनी ही रही। 70 के दशक में ईसाइयों की जनसंख्या की वृद्धि दर न के बराबर थी, क्योंकि तब तक परिवार नियोजन के तरीके अपनाने से उनकी जन्म दर भी नियन्त्रण में आ गई। यह प्रक्रिया हिन्दुओं में ईसाइयों की तुलना में थोड़ा देर से शुरू हुई और मुसलमानों में तो और भी देर से, क्योंकि सामाजिक-आर्थिक दृष्टि से मुसलमान समाज बेहद गरीब और पिछड़ा हुआ है।

2. मिथक :-

मुसलमान चार-चार शादियां करके बच्चे चार गुणा रफ्तार से बढ़ाते हैं ।

असलियत :-

यह सर्वाधिक कुप्रचलित मिथक है। पढ़े-लिखे समझदार कहे जाने वाले लोग भी यही मानते हैं कि ज्यादा शादियां करने से जनसंख्या ज्यादा तेजी से बढ़ती है जबकि यह निष्कर्ष एकदम गलत है ।
किसी भी समाज में महिला और पुरुषों की संख्या लगभग आधी-आधी होती है । यद्यपि हिन्दू समाज में महिलाओं की संख्या पुरुषों से कम है। मुसलमानों में भी प्रति हजार पुरुषों के पिछे 930 महिलाएं हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि बच्चा पैदा कर सकने की क्षमता वाली महिलाओं (15 वर्ष से 40 वर्ष)की संख्या भी सीमित है। इन सभी महिलाओं की शादी उतने ही पुरुषों से हो, या अपनी संख्या के आधे पुरुषों से या फिर एक चौथाई से, बच्चे पैदा करने वाली औरतों की संख्या तो उतनी ही रहेगी। अगर एक व्यक्ति चार औरतों से शादी करता है तो इसका स्वाभाविक अर्थ यह निकलता है कि तीन व्यक्तियों को कुंवारा रहना पड़ेगा। इसलिए यह सच नहीं है कि एक से ज्यादा शादियां करने से जनसंख्या में ज्यादा वृद्धि होती है ।

आइये देखते हैं -:

मुसलमान पुरुष          * * * * * * * * * *

मुसलमान महिलाएं     ∆ ∆ ∆ ∆ ∆ ∆ ∆ ∆ ∆ ∆

अगर प्रत्येक मुसलमान चार शादियां करना चाहे तो?

    [ * ]            [ * ]                 [ * ]           [*******]

[ ∆∆∆∆ ]     [ ∆∆∆∆ ]           [ ∆∆ ]
     

केवल दो पुरुष चार-चार शादियां कर पाएंगे, एक पुरुष दो शादियां कर पाएगा और सात मुस्लिम पुरुष कुंवारे रह जाएंगे।
दूसरे, आंकड़े बोलते हैं कि हिन्दुओं में एक से ज्यादा पत्नियां रखने वाले पुरुषों की संख्या का प्रतिशत मुसलमानों से ज्यादा है। सच तो यह है कि मुसलमान पुरुषों को चार शादियाँ करने का अधिकार तो है, लेकिन गरीबी के कारण एक शादी को ही चला पाना उनके लिए मुश्किल होता है। जबकि हिन्दुओं में भी बड़े-बड़े जमींदार, अमीरजादे एक से ज्यादा शादियां कर लेते हैं और पत्नी को मजबूरन सब कुछ सहते रहना पड़ता है।

आइये विभिन्न धर्मों में एक से ज्यादा शादियां करने वालों का प्रतिशत देखते हैं -:

धर्म - हिन्दू
वर्ष - 1961 - 5.8%
वर्ष - 1989 - 5.06%

धर्म - मुसलमान 
वर्ष - 1961 -5.7%
वर्ष - 1989 - 4.3%


(स्त्रोतः रिपोर्ट ऑफ रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इण्डिया, 1989)

3. मिथक :-

समान आचार संहिता लागू न करके मुसलमानों का तुष्टिकरण किया जा रहा है ।

असलियत :- 

पारिवारिक मामलों को छोड़कर इस देश में प्रत्येक नागरिक के ऊपर इस देश के संविधान व कानून के अनुसार ही नियम लागू होते हैं। जहां तक पारिवारिक मामलों की बात है, (जिसमें शादी, तलाक व सम्पति अधिकार मुख्य रूप से आते हैं) मुसलमानों में शरियत कानून लागू है जिसके सन्दर्भ में कहा जाता है कि इसकी जगह समान आचार-संहिता लागू न करके विभिन्न सरकारों ने मुसलमानों का तुष्टिकरण किया है । पहली बात तो यह है कि यह मुस्लिमों का तुष्टिकरण नहीं, बल्कि मुस्लिम महिलाओं वेफ साथ (आधी मुस्लिम आबादी के साथ) अन्याय है । यह कुप्रथा खत्म होनी चाहिए, जो मुस्लिम समाज की महिलाओं को जागरूक बनाकर ही सम्भव है और मुस्लिम महिलाओं की थोड़ी-बहुत जागरूकता के परिणाम भी आने लगे हैं कि अब तलाक लेना मुस्लिम पुरुष के लिए पहले जैसा आसान नहीं रहा । दूसरे, हिन्दुओं में भी समान आचार संहिता लागू नहीं है। दक्षिणी भारत में भानजी पर पहला हक मामा का होता है, जो उत्तरी भारत में सोचा भी नहीं जा सकता। पाकिस्तान से आए हिन्दुओं में बुआ, मासी, मामा की लड़की से शादी आम बात रही है। जो इधर के हिन्दुओं में नहीं थी । हरियाणा, उत्तरप्रदेश के ग्रामीण समाज में अन्तर्जातीय विवाहों के मामलों और वर्जित गोत्रों में विवाह करने पर (चाहे कानून की निगाह में ये विवाह वैध ही क्यों न हों) सामाजिक बहिष्कार व मौत का फतवा तक जारी कर दिया जाता है। बहन द्वारा पिता की सम्पति पर हक जताना घोर कलयुग करार दिया जाता है। हिन्दू पुरुष विवाहेतर सम्बंधों के मामले में पीछे नहीं रहता तो ऐसे में उसके मुसलमानों में बहुपत्नी प्रथा के विरोध का अर्थ क्या यह लिया जाए कि उसे भी यह अधिकार मिले, क्योंकि हिन्दू कट्टरपंथी इसका विरोध इसलिए तो निश्चित ही नहीं करते कि उन्हें मुस्लिम महिलाओं की चिंता है।

4. मिथक :-

शाहबानो केस - मुसलमानों का तुष्टिकरण ।

असलियत :- 

शाहबानो प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट ने एक निर्णय सुनाकर तलाक के बाद हर्जाना प्राप्त करने का अधिकार एक मुस्लिम महिला शाहबानो को दिया था जो अब तक जारी शरियत कानून के खिलाफ था । इस पर राजीव गांधी सरकार ने संसद के अधिनियम द्वारा सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय को रद्द कर दिया था। इसे मुसलमानों के तुष्टीकरण का नाम देकर संघ परिवार खूब प्रचारित करता है। वास्तव में यह मुसलमानों का नहीं, मुसलमानों के धर्मिक नेताओं का तुष्टिकरण था ताकि मुसलमानों के वोट कांग्रेस हथिया सके। चूंकि मुस्लिम समाज पिछड़ा व ज्यादा संकीर्ण है, अतः उस पर उनके धर्मिक नेताओं की पकड़ भी ज्यादा है, शाहबानो केस में राजीव सरकार की भूमिका एकदम गलत रही है। मुसलमानों की 75 प्रतिशत आबादी (महिलाएं व बच्चे) के लिए तो यह केस उनके जनवादी अधिकारों पर भयंकर चोट साबित हुआ क्योंकि तलाक की स्थिति में महिला और उसके बच्चों के लिए कोर्ट द्वारा दिया गया एक कमजोर सहारा भी राजीव सरकार ने छीन लिया । फिर मुसलमानों का तुष्टिकरण कहां से हुआ? मुसलमानों के धर्मिक नेताओं के तुष्टिकरण व आम मुस्लिम समाज के उत्पीड़न के इस भेद को समझने की आवश्यकता है ।

5. मिथक :-

मुसलमान नसबन्दी का विरोध करते हैं।

असलियत :-

 मुसलमान केवल भारत में ही नहीं रहते, दुनिया के बहुत से देशों में मुसलमान रहते हैं और ऐसे अनेक देश हैं जहां का मुसलमान परिवार नियोजन व नसबंदी में यकीन करता है जैसे कि इन्डोनेशिया, इराक, टर्की, पूर्वी यूरोप आदि। भारत में अगर कुछ हिस्सों में इसका विरोध है तो इसके पीछे धर्म नहीं बल्कि अज्ञानता व अशिक्षा जिम्मेदार है। ठीक वैसे ही जैसे हिन्दू पुरुष भी नसबंदी से बचता है ।

6. मिथक :-

मुसलमान पाकिस्तान समर्थक होते हैं ।

असलियत :- 

 जब किसी से पूछते हैं कि कैसे मुसलमान पाकिस्तान समर्थक हैं तो एकमात्र उत्तर सुनने को मिलता है कि जब पाकिस्तान क्रिकेट मैच जीतता है तो भारत का मुसलमान खुशियां मनाता है । कितने मुसलमानों ने खुशियां मनाईं, कहां मनाईं, कब मनाईं, नहीं जानते, परन्तु इस बात पर सब यकीन करते हैं कि पाकिस्तान द्वारा मैच जीतने पर भारतीय मुसलमान चूंकि खुशियां मनाता है इसीलिए उसकी सद्भावना व सहानुभूति पाकिस्तान के साथ है। यह भी एक मिथक है। क्रिकेट देशभक्ति नापने का पैमाना नहीं हो सकता। भारत-पाकिस्तान में क्रिकेट एक युद्ध की तरह खेला जाता है। जहां खेल भावना पीछे छूट जाती है और जीत को युद्ध में हुई जीत की तरह महिमामण्डित किया जाता है। कभी किसी क्रिकेट के मैदान पर अगर कुछ मुसलमानों ने पाकिस्तान की जीत पर खुशी जाहिर की है तो इसका अर्थ यह नहीं कि तमाम मुसलमान गद्दार हैं। देश की गुप्त सूचनाएं पाकिस्तान के हाथों तक पहुंचाने वाले लगभग सभी गद्दार हिन्दू हैं। लेकिन यह कहना गलत होगा कि पूरा हिन्दू समाज गद्दार है। हवाला, तहलका, ताबूत, बोफोर्स घोटालों में संलिप्त गद्दारों को क्या हम धर्म के नाम से पहचानेंगे। आज कोई व्यक्ति पाकिस्तान का झण्डा अपने स्कूटर/मोटर साईकिल पर लगाकर घूमे यह सोचना भी सम्भव नहीं है। किन्तु इग्लैंड व अमरीका के झण्डे लगाकर घूमना ज्यादातर युवा शान की बात समझते हैं । इग्लैंड, जिसने हमें 200 साल तक गुलाम बनाया और अमरीका, जो आज दुनिया का सबसे बड़ा लुटेरा व आतंकवादी देश है। संघियों का ध्यान कभी इस ओर नहीं गया क्योंकि इस दुष्प्रचार के पीछे भी उनका मकसद मुसलमानों को बदनाम करना है, गद्दारों को ढूंढ़ना नहीं ।

7. मिथक :-

मुसलमान ज्यादा कट्टर होते हैं।

असलियत :- 

कट्टर हिन्दू या मुसलमान नहीं होता, कट्टरता या जुनून इन्सान में कट्टरपंथी या दकियानूसी ताकतें भर देती हैं। पिछले 50 वर्षों में देश के किसी भी इलाके में आम मुसलमानों ने इकट्ठे होकर हिन्दुओं के धर्मस्थल नहीं गिराए किन्तु ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं जहां मुसलमानों के धर्मस्थलों को हिन्दुओं ने नुकसान पहुंचाया है। 1984 में दंगाइयों ने निर्दोष सिक्खों को जलते टायर डालकर मार डाला था। तीन दिनों में देश में 5000 निर्दोष सिक्ख मारे गए थे और ये दंगाई हिन्दू थे। इसी प्रकार दहेज के लिए दुल्हन को जिन्दा जला देना या लिंग चयन करवाकर गर्भपात करना क्या कम क्रूरता है और इसे क्या हिन्दुओं की क्रूरता कहना उचित होगा? नहीं! दुनिया के इतिहास में धर्म के नाम पर जघन्य काण्ड हुए हैं। भारत में भी इतिहास में क्रूरता सिर्फ मुसलमान शासकों ने नहीं, सभी शासकों ने दिखाई है। सम्राट अशोक अपने भाइयों को मारकर गद्दी पर बैठा था । बौद्धों का कत्लेआम हिन्दू राजाओं ने किया था, वैष्णवों व शैवों के बीच खूनी युद्ध हुए हैं जिसके चलते भारत में अखाड़े बने थे। स्वर्ण हिन्दू समाज ने दलितों/शूद्रों को कभी इंसान नहीं समझा। लेकिन इससे हम इस निर्णय पर नहीं पहुंचेंगे कि हिन्दू कट्टर होता है। आम हिन्दू या मुसलमान शान्ति से रहना चाहता है, अपने बीबी बच्चों के साथ मिलकर दो वक्त की रोटी चैन से खाना चाहता है। वह कट्टर नहीं होता।

सबसे बढ़कर, पिछले 50 वर्षों में हुए दंगों में किसका जानमाल का नुकसान ज्यादा हुआ है इसके आंकड़े ही इस बात को झूठा साबित कर देते हैं कि मुसलमान ज्यादा कट्टर होते हैं।

1. अहमदाबाद (1969)

मृतक - हिंदू - 24
मृतक - मुसलमान - 413
जलाई गई दुकानों की संख्या 
हिंदू - 671
मुसलमान - 6071
संपत्ति का नुकसान 
हिंदू - 75 लाख 
मुसलमान - 340 लाख 

2. भिवंडी (1970)

मृतक - हिंदू - 17
मृतक - मुसलमान - 59
संपत्ति का नुकसान 
हिंदू - 83 हजार
मुसलमान - 33 लाख

3. जलगांव (1970)

मृतक - हिंदू - 1
मृतक - मुसलमान - 42

4. रांची हटिया (1967)

मृतक - हिंदू - 19
मृतक - मुसलमान - 164

5. बनारस (1977)

मृतक - हिंदू - 12
मृतक - मुसलमान - 24

6. जमशेदपुर (1979)

मृतक - हिंदू - 80
मृतक - मुसलमान - 150

7.  दिल्ली व अन्य (1984)

5000 सिक्खों का कत्लेआम

8. महाराष्ट्र/गुजरात (1992-93)

कृष्णा आयोग रिपोर्ट के अनुसार अधिकतर मुसलमान मारे गए।

9. गुजरात (दिसंबर 2002)

मृतक - हिंदू - 254
मृतक - मुसलमान - 790

(स्त्रोत -: विभूति नारायण राय -- उच्च पुलिस अधिकारी द्वारा संकलित)
 

8. मिथक :-

आज तक की सरकारों ने मुसलमानों का तुष्टीकरण किया है ।

असलियत :- 

 तुष्टीकरण का अर्थ है अपने स्वार्थों के लिए किसी वर्ग विशेष को जरूरत से ज्यादा सुविधएं/रियायतें प्रदान करना। भारत में मुसलमानों की आबादी 14.2% है। जबकि विभिन्न नौकरियों/विभागों में उनकी संख्या इस प्रकार है -

 आई.ए.एस. ऑफिसर = 2.86%
 आई.पी.एस. ऑपिफसर = 2.0%
 हाईकोर्ट न्यायाधीश = 4.5%
 लेबर कोर्ट न्यायाधीश = 6.47%
 ग्रेड वन की अन्य सेवाएं = 3.04%
 बैंक सेवाएं = 2%
 प्रथम श्रेणी कर्मचारी = 1.61%
 तीन करोड़ से बीस करोड़ के उद्योगपति = 1.9%
 एक्जीक्यूटिव वर्ग (सार्वजनिक क्षेत्र) = 3.19%
 टैक्नीकल सुपरवाईजर = 4.3%

 (इसी प्रकार संसद में भी कभी 12% मुस्लिम नहीं पहुंचे।)

तो कहां है मुसलमानों का तुष्टीकरण ?
उत्तर मिलता है - हजयात्रा में मुसलमानों को रियायत मिलती है । लेकिन भारत के अनेक मन्दिरों (उदाहरण के लिए जगन्नाथपुरी, सोमनाथ, बालाजी) व धर्मिक मेलों पर भी तो सरकार करोड़ों रुपया खर्च करती है। अतः तुष्टीकरण की बात एकदम निराधार है, उल्टे अभी तक उन्हें उनका वाजिब हिस्सा भी नहीं मिला है ।

9. मिथक :-

हिन्दू राष्ट्र बनने से भारत की सभी समस्याएं हल हो जायेंगी।

असलियत :- 

दुनिया का एकमात्र हिन्दू राष्ट्र नेपाल दुनिया के सर्वाधिक गरीब लोगों का देश है। हर साल कई लाख हिन्दू नेपाली लड़कियां भारत की मण्डियों में बिकती हैं। नेपाल वेफ आधे नौजवानों को अपने देश के बाहर रोजगार की तलाश में भटकना पड़ता है । भारत हिन्दू राष्ट्र बन भी जाए तो भी यहां के दलितों, आदिवासियों, मजदूरों, किसानों का शोषण जारी रहेगा, क्योंकि उनका शोषण कोई मुसलमान नहीं कर रहा बल्कि यहां का शासक वर्ग, बड़े जमींदार, अफसरशाही तथा विदेशी कंपनियों के दलाल पूंजीपति कर रहे हैं। यहां की जनता की समस्याएं मुसलमानों के खिलाफ लड़ कर नहीं, बल्कि इन शोषक वर्गों के खिलाफ लड़कर दूर होंगी ।

10. मिथक :-

दुनिया के तमाम आतंकवादी मुसलमान हैं ।

असलियत :- 

 यह एक नया मिथक है। जिसे विश्व व्यापार केन्द्र पर हुए हमले के बाद ज्यादा प्रचार मिला है। आतंकवाद की परिभाषा विभिन्न वर्गों के लिए भिन्न-भिन्न है। अंग्रेजों के लिए भगतसिंह आतंकवादी थे, हमारे लिए देशभक्त नायक। अपने देश व अपने अधिकारों के लिए लड़ना अगर आतंकवाद है तो मानव स्वभाव से ही आतंकवादी है क्योंकि गुलामी के खिलाफ मानव ने हमेशा से जंग लड़ी हैं और यह लड़ाई सभी धर्मों के लोगों द्वारा लड़ी गई हैं। आज दुनिया जिसे मुस्लिम आतंकवाद के नाम से जानती है, वह वास्तव में मुस्लिम जनता का अमरीकी साम्राज्यवाद विरोध है। 60 व 70 के दशक में स्वयं अमरीका ने सोवियत संघ के फैलाव को रोकने के लिए मुस्लिम कट्टरता को बढ़ावा दिया और मुस्लिम जगत में अपना लूट का शासन कायम किया। अतः आज वहां अमरीकी विरोध भी उसी मुस्लिम कट्टरता के रूप में हो रहा है ।
आज दुनिया के अनेक देश हैं जहां शासक वर्गों की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ जनता हथियार उठाकर लड़ रही है, जैसे; नेपाल, टर्की, पेरू, कोलम्बिया, उत्तरी आयरलैंड, भारत, फिलीपीन्स आदि। इस जनता को वहां की सरकारें आतंकवादी बोलती हैं, और वे मुसलमान नहीं है।

11. मिथक :- 

हिन्दू धर्म को नीचा दिखाने के लिए मुसलमान शासकों ने मन्दिर तोड़े।

असलियत :- 

 इतिहास में जब भी मंदिर तोड़ने वाले मुसलमान शासकों का नाम आता है तो उसमें दो नाम बेहद कुख्यात हैं, महमूद गजनवी जिसने सोमनाथ का मंदिर तोड़ा था और औरंगजेब जिसने काशी व मथुरा के मंदिर तोड़े थे।
महमूद गजनवी अफगानिस्तान में गजनी नामक स्थान का शासक था जो गजनी से गुजरात पहुंचा था जहां सोमनाथ का मंदिर है। इसमें कोई शक नहीं कि गुजरात के सोमनाथ मंदिर तक पहुंचने के लिए उसने सैंकड़ों किलोमीटर का रास्ता तय किया था। सोचने का विषय है कि उसके रास्ते में पड़ने वाले मंदिरों का क्या हुआ? आम हिन्दूवादी समझ कहती है कि वे सभी मंदिर टूट जाने चाहिए थे। बामियान की विश्व प्रसिद्ध बुद्ध की मूर्तियां उसके रास्ते में पड़ती थीं लेकिन उसने उन्हें छुआ तक नहीं। सोमनाथ मंदिर की ओर बढ़ते हुए जब वह मुल्तान से गुजरा तो वहां के नवाब अब्दुल फतह दाऊद ने उसको आगे बढ़ने से रोक दिया। इस पर दोनों में लड़ाई हुई इस लड़ाई के दौरान मुल्तान की जामा मस्जिद गिरा दी गई। इसके बाद गजनवी एक अन्य शहर थानेश्वर से होकर गुजरा, जिसके राजा आनंदपाल ने उसे जाने का रास्ता दे दिया, अतः गजनवी ने उसे कुछ नहीं कहा।
उपरोक्त उदाहरण से साफ है कि अगर गजनवी इस्लाम के प्रचार के लिए निकला होता तो किसी भी सूरत में मस्जिद न गिराता और रास्ते के सभी मंदिरों को तोड़ता हुआ निकलता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उसने सिर्फ सोमनाथ के मन्दिर को ही क्यों गिराया। कहा जाता है कि सोमनाथ मन्दिर में उस वक्त 200 करोड़ रुपये का सोना, हीरे, जवाहरात आदि थे। जिन्हें लूटने के लिए वह इतनी दूर से आया था।
महमूद गजनवी की सेना में एक तिहाई हिन्दू थे और उसके 12 सिपहसालारों में से 5 हिन्दू थे। जिनके नाम थे, तिलक, हरजन, राज, सौन्धी और हिन्द। सोमनाथ जीतने के बाद उसने अपने प्रतिनिधि के तौर पर एक हिन्दू राजा को वहां नियुक्त कर दिया और अपनी मुद्रा जारी की जिस पर संस्कृत में शब्द अंकित थे।
अब एक दूसरा उदाहरण देखें। 11वीं शदी में कश्मीर में राजा हर्षदेव का शासन था। उसके दरबार में कल्हण नाम का कवि था, जिसने राजतरंगिणी नामक प्रसिद्ध किताब भी लिखी थी। इस पुस्तक में कल्हण ने लिखा है कि हर्षदेव ने एक पद पैदा किया, जिसका नाम था ‘देवो पदनायक’ । इसका अर्थ था, वह अधिकारी जो देवी-देवताओं की मूर्तियां तुड़वा रहा हो। इसमें खास बात यह है कि उसे उन मूर्तियों से कोई मतलब नहीं था जो पत्थर की बनी हुई थीं, उसकी रुचि केवल सोने, चांदी या कीमती पत्थरों से जड़ी मूर्तियों में ही थी।
एक मजेदार घटना मराठा-टीपू संघर्ष की भी है। एक बार मराठा सेना ने टीपू सुल्तान पर हमला किया लेकिन इसका कोई परिणाम नहीं निकला। वापिस जा रही मराठा सेना ने टीपू सुल्तान के इलाके में स्थित श्रीरंगपट्टनम नामक स्थान पर एक हिन्दू मंदिर गिरा दिया जिसे टीपू सुल्तान ने पुनः बनवाया। हिन्दू होने के बावजूद मराठों द्वारा मंदिर गिराने का मकसद टीपू सुल्तान को अपमानित करना था।
अब चर्चा औरंगजेब की करें, अपने शासनकाल में औरंगजेब ने कई मंदिर और मस्जिद तुड़वाए तो कई बनवाए भी। उनके रखरखाव के लिए उन्हें जागीरें भी प्रदान कीं। काशी और वृन्दावन के कई मन्दिरों को जमीन देने के अनेक फरमान एक महान इतिहासकार डॉ. विशम्भर नाथ पाण्डेय ने अपनी पुस्तक ‘राजा औरंगजेब के फरमान’ में संकलित किए हैं। इलाहाबाद नगर पालिका में सोमेश्वर नाथ महादेव मंदिर, उज्जैन में महाकालेश्वर मंदिर, चित्राकूट में बालाजी मंदिर, गुवाहाटी में उमानंद मंदिर, शत्रांजय में जैन मंदिर आदि। ये कुछ अन्य मंदिरों के उदाहरण हैं जिन्हें औरंगजेब की तरफ से अनुदान/जागीरें आदि प्रदान की गई थीं।
एक वाक्या और, गोलकुंडा के नवाब ने औरंगजेब को नजराना भेजने से इन्कार कर दिया। औरंगजेब के जासूसों ने उसे खबर दी कि नवाब ने अपना खजाना मस्जिद में छुपाकर रखा है। औरंगजेब ने आदेश दिया कि मस्जिद को खोद दिया जाए और सारा खजाना दिल्ली लाया जाए। उसवेफ आदेश का पालन हुआ और मस्जिद गिरा दी गई।
अकबर के नवरत्नों में से 2 हिन्दू थे। शाहजहां के प्रशासकीय ढांचे में 24 प्रतिशत हिन्दू राजा थे जबकि औरंगजेब के प्रशासकीय ढांचे में 34 प्रतिशत हिन्दू राजा थे।

12. मिथकः- 

राणाप्रताप ने अकबर के विरुद्ध व शिवाजी ने औरंगजेब के विरुद्ध हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए युद्ध लड़े थे।

असलियत :- 

यह भी एक प्रसिद्ध मिथक है। आमतौर पर पोस्टरों व कैलेण्डरों में भगतसिंह व चन्द्रशेखर आजाद के साथ राणाप्रताप व शिवाजी के फोटो रहते हैं। ऐसा करके दिखाया जाता है कि भगतसिंह व आजाद की तरह वे भी स्वतंत्रता सेनानी थे। राणा प्रताप व शिवाजी को मुगल शासकों के विरुद्ध आजादी की लड़ाई लड़ने वालों के रूप में स्थापित किया गया है। सच्चाई यह नहीं है। राणा प्रताप-अकबर की लड़ाई में राजा मानसिंह अकबर के सेनापति के रूप में लड़ रहा था जबकि राणा प्रताप का प्रमुख सहयोगी हाकिम खान सूर था। दोनों ही सेनाओं में हिन्दू और मुस्लिम सिपाही थे। वास्तव में यह लड़ाई धर्म के लिए नहीं, पदवी के चलते हुई थी। अकबर अपने राज्य का विस्तार कर रहा था और इस प्रक्रिया में वह विभिन्न राजाओं को अपने राज्य में शामिल करने की एवज में विभिन्न पदवियां दे रहा था। उसने राणा प्रताप को पांच हजारी (वह राजा जो पांच हजार सिपाही अपने मातहत रख सकता था।) की पदवी दी। राणा प्रताप दस हजारी की पदवी चाहता था जिसके लिए अकबर तैयार नहीं हुआ। इसके चलते यह युद्ध हुआ। बाद में जहांगीर ने राणा के लड़के अमरसिंह को जब दस हजारी की पदवी दी तो वह खुशी-2 जहांगीर का सहयोगी बन गया।
शिवाजी को मुस्लिम विरोधी राजा के तौर पर पेश किया जाता है। सच्चाई इसके विपरीत है। शिवाजी की सेना में अनेक मुसलमान थे। शिवाजी का विश्वासपात्र सचिव मौलाना हैदर अली था। शिवाजी के मुख्य सेनापतियों के नाम दौलत खान और सिद्दमिसी थे और ये दोनों ही मुस्लिम थे। जिस व्यक्ति ने उन्हें आगरा जेल से भागने में मदद की, वह भी एक मुस्लिम मादरी-महतार नाम का व्यक्ति था। शिवाजी ने जगदीशपुर मंदिर में अपने महल के सामने स्वयं एक मस्जिद का निर्माण करवाया था। अतः शिवाजी तथा औरंगजेब का संघर्ष धर्म के लिए लड़ा जाने वाला युद्ध नहीं था। यह तो दो राजाओं के बीच होने वाली लड़ाई थी।

13. मिथक :- 

हिन्दूओं का जबर्दस्ती धर्म परिवर्तन किया गया।

असलियत -: 

यह भी एक अति प्रचारित किन्तु आधरहीन तथ्य है कि अतीत में हिन्दुओं का बड़ी संख्या में जोर जबरदस्ती करके धर्म परिवर्तन किया गया। इस एक मिथक के आधर पर संघ परिवार हिन्दू जनता में प्रतिशोध की भावना पैदा करने में कामयाब हुआ है। धर्म श्रद्धा व विश्वास का मामला है। किसी की श्रद्धा और आस्था राम से हटा कर अल्लाह में पैदा करना नामुमकिन है। जबर्दस्ती अल्लाह बुलवाया जा सकता है, जबर्दस्ती गाय का मांस खिलाया जा सकता है लेकिन जबर्दस्ती अल्लाह में श्रद्धा पैदा नहीं की जा सकती। ऐसा नहीं है कि इतिहास में धर्म परिवर्तन न हुए हों, लेकिन उसका कारण जोर जबर्दस्ती नहीं रहा। मसलन हिन्दुओं के उच्च सम्भ्रात वर्ग ने धर्म परिवर्तन लालच में किया क्योंकि मुसलमान होने से पदोन्नति या शासक का कृपापात्र बनना हिन्दु की बजाय आसान था, इसलिए हिन्दु शासकों ने अपना रुतबा बनाए रखने के लिए धर्म परिवर्तन किया। इस श्रेणी में जमींदार व कुलीन तन्त्र शामिल थे।
दूसरी श्रेणी में वे लोग थे जिन्हे तलवार के बल पर गाय का मांस खाने या अल्लाह बोलने के लिए मजबूर किया गया। जब उन्होंने वापिस अपने धर्म में आने की कोशिश की तो शुद्धिकरण के नाम पर कर्मकांड करने के लिए ब्राह्मणों पुरोहितों ने उनके सामने कठिन शर्तें रखीं जिन्हें पूरा करना उनके लिए सम्भव नहीं था और वे नए धर्म में ही बने रहे।
लेकिन सर्वाधिक बड़ी संख्या उन दलितों व गरीब जनता की थी जिसने अपनी मर्जी से धर्म परिवर्तन किया क्योंकि हिन्दू धर्म का जातिवाद उन्हें इंसान मानने से भी इंकार कर रहा था। अतः एक इंसान की गरिमामयी जिंदगी की चाहत में उन्होंने इस्लाम का रास्ता चुना। कई लोगों ने सूफी सन्तों के मानवतावादी दृष्टिकोणों से प्रभावित होकर भी धर्म परिवर्तन किया था।


14. मिथक :- 

ईसाई मिशनरियां नौकरी और लड़की का लालच देकर नवयुवकों को इसाई बना रही हैं।

असलियत :-

‘लड़की’ का लालच देकर ईसाई बनाने वाला मिथक न केवल घटिया मानसिकता का प्रतीक है बल्कि इस मिथक को फैलाने वाले महिलाओं के बारे में कितनी निचले दर्जे की सोच रखते हैं, इससे  यह भी स्पष्ट होता है। ये लड़कियां जो धर्म परिवर्तन करने वाले नवयुवकों को ‘उपहार-स्वरूप’ दी जाती हैं क्या किसी फैक्टरी में पैदा होती हैं कि टीवी या साईकिल की तरह धर्म परिवर्तन करने वाले को लड़की भी साथ में दे दी। ये लड़कियां भी किसी की बेटी, किसी की बहन होती होंगी। शादी से पहले क्या उनके मां-बाप जांच-पड़ताल नहीं करते होंगे कि जिस व्यक्ति से उनकी लड़की की शादी हो रही है, वह कैसा है? कोई भी मां-बाप अपनी लड़की किसी को ‘उपहार’ में नहीं देगा। धर्म परिवर्तन करने वाले नौजवानों के रिश्ते भी वैसे ही होते हैं, जैसे समाज में अन्य नवयुवकों के होते हैं।