Wednesday, 6 January 2021

किसान आंदोलन पर हिंदी गीत


टेक -: रै छिड़गी जंग उठो रै भाई 

         यू दुश्मन मार गिराणा सै

       (अमनप्रीत विद्यार्थी)



1. सब खातर अन्न पैदा करता

    खून-पसीना एक तू करता 

    फेर भी तू तो भूखा मरता

    नाज तेरा मंडी म्ह रुलता

    कद तक चुप बैठ्या रहैगा

    जुलमां नै चुपचाप सहैगा

    संघर्ष राह पै चलो र भाई  

    दुश्मन मार गिराणा सै ।


2. काले कानून लेकै आया

    खेल नया डाकी नै रचाया

    जमीन लेण का प्लान बणाया

    मंडी खत्म करेंगें सरकारी

    MSP लुट्जयागी म्हारी

    जमाखोरी होवैगी भारी 

    बिल बिजली के घणे बढ़ाए

    सरकारी महकमे निजी बणाए

    इन्ने शर्म कती ना आई 

    देश की इज्जत बेच कै खाई

    ना पाछै कदम हटो रै भाई...

    के दुश्मन मार भगाणा सै !



3. मिलबैठ कै सोचो बहण अर भाई 

    नेता देखो यें बणे कसाई 

    भगत सिंह सी सोच बणाल्यो

    उधम सिंह सा जोश जगाल्यो

    ट्रैक्टर ट्रॉली जोड़ कै चालो

    हाथां म्हं सब जेली ठाल्यो 

    पंजाब हरियाणा एक्का करल्यो

    सही दुश्मन पै ध्यान धरल्यो

    इंकलाब का नारा लाओ 

    इन नेत्यां नै सबक सिखाओ 

    सबक सिखाण नै जुटों रै भाई ..

    के दुश्मन मार भगाणा सै!




4.मजदूर किसान और कर्मचारी

   छात्र ,युवा संग म्हं नारी ,

   मेहनतकश की एकता भारी 

   दिनों दिन या बढ़ती जरह्यी ,

   टोल यें सारे फ्री कराए 

   नेता सारे हामनै भजाए ,

   गाजीपुर ,सिंघु अर टिकरी 

   चलरह्ये म्हारे पहरे ठीकरी , 

   इब या लड़ाई नही रुकैगी 

   जनता बिल्कुल नही झुकैगी ,

   तोड़ो रै इनकी तानाशाही 

   जनयुद्ध की चालो राही ,

   कुर्बानी तै मिलै आज़ादी 

   मोर्चे पै या रीत चलादी 

   चाहे इंच इंच कटो रै भाई दुश्मन ..



Monday, 4 January 2021

लघुकथाएं


(प्रोफेसर हरभगवान चावला द्वारा लिखी गई छह लघुकथाओं को हम अभियान के ब्लॉग पर दे रहे हैं जिन्हें पढ़ते हुए हम महसूस कर सकते हैं कि लेखक समाज के प्रति किस तरह से अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह कर सकते हैं। सामाजिक सरोकारों से जुड़ी हुई ये कहानियां हमें वर्तमान दौर में चल रहे संघर्षों को समझने में मदद करती हैं।)



 1. क़िस्से 


जंगल के एक बड़े पेड़ के नीचे हिरणों का झुण्ड जमा था। हमेशा की तरह आज भी चर्चा के केन्द्र में एक शिकारी था। हिरण उसकी चतुराई, उसकी नज़र, उसके अचूक निशाने की तारीफ़ कर रहे थे। तभी झुण्ड के एक हिरण का ध्यान उस हिरण पर गया जो चर्चा से असम्पृक्त चुपचाप बैठा हुआ था। उसने पूछा- किस समाधि में लीन हो मित्र, कुछ बोल ही नहीं रहे हो?
- हम जब भी मिलते हैं, किसी न किसी शिकारी की बहादुरी और नृशंसता का गुणगान करने लगते हैं, यह जानते हुए भी कि इन्हीं शिकारियों की वजह से हमारा अस्तित्व तक समाप्त होने को है। मुझे आश्चर्य होता है कि हम अपने क़ातिलों पर मुग्ध हैं। हम अपने बच्चों को विरासत में क्या दे रहे हैं- कायरता और असहायता। काश, हमने अपने उन साथियों के क़िस्से सुनाए होते, जिन्होंने शिकारियों को नाकों चने चबवा दिए। ऐसा होता तो हम और हमारे बच्चे आज शिकारियों के सामने चुपचाप समर्पण करने की बजाय लड़ रहे होते। हम लड़ते हुए मर जाते तो हमारी मौत गर्व की मौत होती, शिकारी को मार देते तो आने वाली नस्लों के लिए प्रेरणास्रोत होते। कम से कम बिना लड़े मर जाने की शर्मिंदगी का कलंक तो हमारे सर नहीं होता।
अब उस पेड़ के नीचे किसी शिकारी का क़िस्सा नहीं था, चुप्पी थी, जो मुखर हो जाने को आकुल थी।


2. मदारी


एक फ़क़ीर गाँव में आया । बच्चों ने उसे घेर लिया । फ़क़ीर ने अपने झोले में से पकवान निकाले, फूल निकाले, खिलौने निकाले और फिर तृप्त बच्चों को सुन्दर-सुन्दर, क़ीमती रेशमी कपड़ों से सजा दिया । बच्चे अब राजकुमारों जैसे लग रहे थे । वे ख़ुश थे, बार-बार फ़क़ीर को चूमते और तालियाँ बजाते । गाँव के लोग इस दृश्य को देखकर विह्वल हो गये और फ़क़ीर की जय-जयकार करने लगे । फ़क़ीर ने झोला उठाया, सबको प्रणाम किया और अगले गाँव की तरफ़ चल दिया । उसके जादू में बँधी भीड़ भी जय-जयकार करती उसके पीछे-पीछे चल दी । 
फ़क़ीर ने उधर गाँव की सीमा लाँघी कि इधर बच्चे भूख-भूख चिल्लाते हुए रोने लगे । उन्हें इतनी भूख महसूस हो रही थी कि जैसे जन्म के बाद से उन्होंने कुछ भी न खाया हो । सारे फूल, खिलौने और रेशमी वस्त्र भी ग़ायब हो गये थे । आश्चर्य तो यह कि उनके तन के वे पुराने वस्त्र भी अब उनके तन पर न थे । गाँव भर ने इसे क़िस्मत का खेल माना तथा यह तय पाया कि उनकी क़िस्मत के बंद हो गये तालों को वह फ़क़ीर ही खोल सकता है । गाँव उस फ़क़ीर का भक्त हो गया । कोई नहीं समझ पाया कि दरअसल वह फ़क़ीर एक मदारी था और कुछ पलों का करतब दिखा बच्चों के पेट का खाना तथा तन के वस्त्र लूट ले गया था ।


3. पैंतरा


सत्ताधारी दल के एक नेता पर भ्रष्टाचार के बहुत गंभीर आरोप थे। विपक्षी दल लगातार सरकार से इन आरोपों की जाँच करवाने की माँग कर रहे थे। सरकार आरोपों को निराधार बताते हुए विपक्ष को ग़ैरज़िम्मेदार ठहराने में लगी थी। ऐसे में ख़बर आई कि एक बड़े वकील ने नेता पर लगे आरोपों की जाँच करवाने की माँग को लेकर न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की है। नेता के कुछ विरोधी लोग चौपाल में बैठे इस ख़बर पर बात कर रहे थे। एक व्यक्ति ने अख़बार में छपी इस ख़बर को गुनगुनाते हुए पढ़ा और कहा, "अभी सब कुछ ख़त्म नहीं हुआ है। आज भी अच्छे लोग मौजूद हैं। अब देखना, यह नेता बचेगा नहीं। न्यायालय ज़रूर अपनी निगरानी में आरोपों की जाँच करवाएगा।" लोग पूरी तरह आश्वस्त होते, उससे पहले ही एक और व्यक्ति ने कहा, "इस देश के लोग कितने सहज विश्वासी हैं। काश, वैसा ही होता, जैसा आप सोच रहे हैं। आप लोग परिष्कृत न्याय प्रणाली से परिचित नहीं हैं। मैं बताता हूँ कि यह नेता अब आरोपों से मुक्त हो जाएगा।"
"यह कैसे संभव है? उसके विरुद्ध याचिका दायर हुई है, आरोपमुक्त कैसे हो जाएगा?" कुछ लोगों ने एक साथ आपत्ति दर्ज की।
"ध्यान से सुनो मेरी बात। चर्चा थी कि विपक्ष इस नेता के विरुद्ध याचिका दायर करेगा। चर्चा थी कि नहीं?"
"हाँ, चर्चा तो थी।" एक व्यक्ति ने कहा।
"अब इस वकील के बारे में भी जान लीजिये। यह वकील सत्ताधारी दल के बहुत नज़दीक है। विपक्षी दल पूरे सुबूतों के साथ याचिका डालते, उससे पहले ही इस वकील ने अपर्याप्त सुबूतों के साथ याचिका दायर कर दी। अपर्याप्त सुबूतों की बिनाह पर यह याचिका ख़ारिज हो जाएगी। और जब विपक्ष याचिका दायर करेगा तो वह इस आधार पर रद्द हो जाएगी कि इस मामले से सम्बंधित एक याचिका पहले ही रद्द की जा चुकी है, मामले में कोई दम नहीं है, बेवजह न्यायालय का समय नष्ट किया जा रहा है। इस तरह नेता को क्लीन चिट मिल जाएगी। यह और कुछ अन्य वकील पहले कई बार ऐसा कर चुके हैं।"
जज बिक जाते हैं, जज डर जाते हैं, जजों के तबादले हो जाते हैं, जज राजनीतिक सम्बन्धों के कारण ग़लत निर्णय देते हैं- लोग ये बातें अक्सर सुना करते थे और न्याय को लेकर आशंकित हो जाते थे। इस नए पैंतरे की जानकारी ने न्याय के प्रति उनकी आस्था को और डगमगा दिया। एक आदमी सहसा कह उठा, "आम आदमी तो इन्साफ की उम्मीद न ही करे, जिसकी लाठी, उसकी भैंस।"


4. इन्सान का दर्द


लोग काले क़ानून के विरुद्ध सड़कों पर उतर आए थे। शहर में निकलने वाले हर जुलूस में शामलाल शामिल रहते। बेटा उनसे कहता, "हम दूर-दूर तक इस क़ानून की ज़द में नहीं आते, आपको क्या ज़रूरत है दूसरों के फट्टे में टाँग अड़ाने की?" शामलाल का एक ही जवाब होता, "सत्ता एक-एक करके समूहों का शिकार करती है। इन्सान वो जो दूसरे इन्सान का दर्द समझे।" बेटा वरुण वितृष्णा से मुँह बिचका देता।
एक दिन शामलाल को कुछ अन्य लोगों के साथ गिरफ़्तार कर लिया गया। जेल में भी उन लोगों का शांतिपूर्ण विरोध जारी था। पुलिस वालों को उन सबसे कोई शिकायत नहीं थी, बल्कि वे जैसे ही थोड़ा ख़ाली होते, उनके विद्वत्ता से भरे वक्तव्य सुनते, चमत्कृत होते, सहमत होते। एक दिन शामलाल को मालूम हुआ कि थोड़ी देर बाद कुछ और आंदोलनकारी जेल में लाए जा रहे हैं। क़रीब घण्टे भर बाद आंदोलनकारियों ने जेल में प्रवेश किया तो शामलाल को यह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि इन लोगों में उसका बेटा भी था। वह चीखा, "अरे तू भी...?"
"हाँ, मैं भी। इन्सान वो जो दूसरे इन्सान का दर्द समझे! याद तो है न यह बात, कि भूल गए?"
दोनों ने एक साथ ठहाका लगाया और एक दूसरे की तरफ़ अँगूठे का विजय चिह्न लहरा दिया।


5. बीसवाँ कोड़ा


(लघुकथा संग्रह 'बीसवाँ कोड़ा' की शीर्षक लघुकथा)

अपने पालतू सफ़ेद कबूतर का पीछा करते हुए राजकुमार कब छोटी रानी के महल में दाख़िल हो गया, उसे पता ही नहीं चला। रानी के महल में राजा के अलावा किसी परिंदे को भी घुसने की इजाज़त नहीं थी, पर यहाँ तो परिंदा ही नहीं, परिंदे का मालिक राजकुमार भी महल में घुस आया था।उस समय रानी वस्त्र बदल रही थी। राजकुमार को रानी के महल में घुसने का दोषी पाया गया। अब वह दोषी था तो सज़ा मिलना भी तय था; लेकिन एक तो राजकुमार, ऊपर से नाबालिग! सो तय किया गया कि राजकुमार को प्रतीकात्मक सज़ा दी जाएगी। हूबहू राजकुमार जैसा रुई का एक पुतला बनाया गया और उस पुतले को बीस कोड़ों की सज़ा सुनाई गई। दरबार में सज़ा देने का सिलसिला आरम्भ हुआ। एक सिपाही जाता, एक कोड़ा मारता, फिर दूसरा जाता, दूसरा कोड़ा मारता। इस तरह उन्नीस कोड़े पूरे हो गए। इस बीच सारे तमाशे को देखता हुआ राजकुमार ख़ामोश बना रहा। कभी उसकी आँखों से कोई आँसू टपक जाता, तो कभी किसी को बहुत धीरे से कूड़ा मारने की रस्म पूरी करते देख उसे हँसी आ जाती। अब बीसवाँ कोड़ा बचा था ।एक सिपाही ने पुतले को कोड़ा मारा। पर यह क्या?पुतले पर कोड़ा पड़ते ही राजकुमार की चीख निकल गई और वह दर्द से बिलबिलाकर दोहरा हो गया। सारे दरबारी हैरान होकर देख रहे थे। राजकुमार की पीठ पर एक धारी थी, जिसमें से लहू रिस रहा था। वज़ीर कुछ देर ध्यान से देखता रहा। उसे सारा माज़रा समझ में आ चुका था । उसने उस सैनिक को बुलाया और गरज कर कहा, " सज़ा के तौर पर कोड़ा मारना तुम्हारा कर्त्तव्य था, पर तुम्हारे मन में गहरा द्वेष भरा था । इसीलिये कोड़ा सीधे राजकुमार की पीठ पर पड़ा और उनकी पीठ पर इतना गहरा घाव हो गया । बताओ, राजकुमार से तुम्हारी क्या व्यक्तिगत शत्रुता है?जल्दी बोलो, वरना सर धड़ से अलग कर दिया जाएगा। सिपाही ने इधर-उधर देखा । सारे सिपाही सर झुकाए खड़े थे। उसने इत्मीनान से वज़ीर की आँखों में आँखें डालकर कहा," मेरी राजधानी में युवाओं को बैल की जगह कोल्हू में जोता जाता है और जब कोई युवा कोल्हू को खींचते हुए बेदम होकर साँस लेने के लिए रुकता है तो उस पर कोड़े बरसाए जाते हैं। कोल्हू में जुतने वाले युवाओं में एक मेरा भी बेटा है। वह रोज़ शाम को जब घर आता है तो उसकी पीठ पर मैं धारियाँ देखता हूँ जिनमें से लहू रिस रहा होता है ।आज जब मैंने राजकुमार के पुतले पर कोड़ा बरसाया तो बरबस मुझे अपने बेटे की पीठ याद आ गई थी।" 


6. सत्य और न्याय


"क्या आप मुझे बता सकते हैं कि मुझ जैसे शांतिप्रिय इन्सान को इस आज़ाद देश में सत्य और न्याय कहाँ मिलेंगे?" वह आदमी, जिसकी दाढ़ी बढ़ गई थी, जो बहुत दिनों से भूखा और प्यासा था, जगह-जगह जाकर यही सवाल पूछता। लोग हँस देते, पागल कहते। कभी-कभी तो बच्चे उस पर पत्थर बरसा देते। अपने इस सवाल को लेकर वह शिक्षकों, डॉक्टरों, वकीलों, जजों के पास जा चुका था। सभी उस पर हँसे थे, जवाब किसी ने नहीं दिया था।
आख़िर वह सत्य और न्याय की तलाश में जंगल में निकल गया। उसने घास में, पेड़ों में, फूलों में, कांँटों में सब जगह सत्य और न्याय को ढूँढ़ा। जंगल में उसे एक चरवाहा मिला। चरवाहे ने उससे जानना चाहा कि वह इन पेड़-पौधों में क्या ढूंँढ़ रहा है। चरवाहे से उसने वही प्रश्न पूछा। चरवाहा हंँस दिया, "सत्य और न्याय जंगल में थोड़े ही मिलेंगे। सत्य और न्याय तो लोगों के व्यवहार और कर्म में होता है। तुम्हारे सवाल का जवाब तो लोगों में ही मिलेगा।"
"किसी ने भी जवाब नहीं दिया। सुना है, तुम्हारी तो सितारों से बात होती है। चरवाहे जब जंगल में भटक जाते हैं तो सितारे उन्हें रास्ता दिखाते हैं।"
"कभी ऐसा होता होगा, अब नहीं होता। अब तो शायद पुजारियों की बात ही सितारों से होती होगी।"
वह आदमी देवालय में पुजारी के पास पहुंँचा। पुजारी ने उसे बैठाया, पानी पिलवाया और फिर पूछा, "भूखे हो?"
"नहीं।"
"तो फिर क्या चाहते हो?"
"क्या आप मुझे बता सकते हैं कि इस आज़ाद देश में सत्य और न्याय कहांँ मिलेंगे? मैंने सुना है आप सितारों से बात कर सकते हैं। आप ज़रूर मुझे बता सकेंगे।"
"अवश्य बताऊंँगा, थोड़ा धैर्य रखो।" पुजारी ने सेवक को आवाज़ देकर एक जूट का बोरा मंँगवाया और उस आदमी से कहा, "इस बोरे में घुसो।" वह आदमी चुपचाप बोरे में घुस कर उत्तर की प्रतीक्षा करने लगा। पुजारी मौन था और उस आदमी को सांँस लेने में दिक़्क़त होने लगी थी। वह बोरे में से चिल्लाया, "मुझे बाहर निकालो, मेरा दम घुटा जा रहा है।"
"निश्चिंत रहो, तुम मरोगे नहीं। बोरे के छिद्रों में से इतनी हवा आ रही है कि तुम ज़िन्दा रह सको। देश के बहुत से लोगों को तो इतनी भी हवा सुलभ नहीं है, फिर भी उन्होंने कभी इतना ख़तरनाक सवाल नहीं पूछा। मुझे तुम्हारे प्रश्न में देशद्रोह और बग़ावत की बू आ रही है। इतना तो तुम जानते ही होगे कि सच्चा प्रभुभक्त सच्चा राजभक्त भी होता है। मेरा कर्तव्य मैंने पूरा किया। अब राजा तुम्हारा निर्णय करेंगे।"
और फिर उस बोरे को लुढ़काकर उसी क़ैदख़ाने में पहुंँचा दिया गया, जहांँ वैसे ही कई बोरे पड़े हुए थे। उन बोरों में क़ैद लोगों ने भी वैसा ही कोई सवाल पूछा था। क़ैदख़ाने में उसने महसूस किया कि बोरे लुढ़कते हैं, एक दूसरे से टकराते हैं और फिर बोरों के भीतर से हंँसी फूटने लगती है- आशा से भरी निर्भीक हँसी। थोड़ी देर बाद उसकी हंँसी भी सामूहिक हंँसी में शामिल हो गई।
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Saturday, 2 January 2021

किसान आंदोलन में जो मांग उठाना जरूरी है

 किसान आंदोलन में जो मांग उठाना जरूरी है

(संदीप कुमार)

(स्वामीनाथन आयोग ने कहा है कि वर्तमान ग्रामीण संकट का एक प्रमुख कारण भूमि सुधार नहीं करना है। किसान संगठनों को इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।)



किसान आंदोलन अपने उफान पर है। प्रत्येक दिन किसानों में उत्साह का संचार करने के लिए किसान नेता नयी-नयी गतिविधियों का ऐलान कर रहे हैं और उन्हें जमीनी स्तर पर भी लागू कर रहे हैं। आंदोलन के नेताओं ने मंचो से व सरकार के साथ बातचीत में स्वामीनाथन रिपोर्ट को लागू करने की मांग को मजबूती के साथ रखा है। लेकिन, पूरी रिपोर्ट पर नहीं, बस रिपोर्ट के एक हिस्से पर ही जोर शोर से आवाज बुलंद की जा रही है और वह है फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP)। जबकि स्वामीनाथन आयोग ने कहा है कि वर्तमान ग्रामीण संकट का एक प्रमुख कारण भूमि सुधार नहीं करना है। किसान संगठनों को इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इसलिये भूमिहीनों व शेड्यूल कास्ट के लोगों को कम से कम जोतने योग्य एक एकड़ जमीन प्राप्त हो यह मांग भी प्रमुखता से उठानी चाहिए। जिससे अपने परिवार के लिए भोजन व पशुओं का चारा जुटाया जा सके। अगर सभी परिवारों को एक-एक एकड़ जोतने योग्य भूमि का वितरण किया जाता है तो इससे लोग अमीर नहीं होंगे बस अपने गुजारे लायक कुछ प्राप्त कर पाएंगे। और जातीय बंधन ढिले होंगे तथा सामाजिक बंदी जैसे सामंती निर्णय भी प्रभावहीन होंगे। लोगों में आत्मसम्मान की भावना बढ़ेगी जिससे मानवीय गरिमा के साथ जिंदगी जिने का अहसास बढ़ेगा। उनकी जिंदगी बेहतर हो इसके लिए कुछ और ज्यादा बेहतर रोजगार तलाशने होंगे।
लेकिन, वर्तमान किसान आंदोलन का नेतृत्व बड़े किसानों व आढतियों के समर्थन से आगे बढ़ रहा है जो अपने वर्गीय चरित्र के हिसाब से जमीन वितरण के सवाल को नहीं उठा रहा है। और यही सबसे बड़ा कारण है कि शेड्यूल कास्ट खुलकर इन जनविरोधी कानूनों की खिलाफत में शामिल नहीं हो पा रही हैं। जमीन की मांग को उठाने की जिम्मेदारी उन किसान नेताओं, छात्रों, लेखकों, पत्रकारों की बनती है जो भारत में जातीय व्यवस्था को समझते हैं और उसे सभ्य समाज में कलंक की तरह देखते हैं। और अम्बेडकरवादी व दलित संगठनों का भी कर्तव्य बनता है कि वर्तमान किसान आंदोलन का समर्थन करते हुए, भूमिहीन वर्ग की जमीन की मांगों को उठाएं ताकि आंदोलन को एक सही दिशा दी जा सके और आगे की ओर एक कदम बढ़ा सकें। 
आज हम सबका कर्तव्य बनता है कि हम अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह करते हुए शेड्यूल कास्ट में जाएं और उन्हें "तीन कृषि कानून विरोधी" किसान आंदोलन में अपनी जमीन की मांग के साथ शामिल होने का आह्वान करें। जबतक हम सभी वर्गों व जातियों को इस जनांदोलन के साथ नहीं जोड़ पाएंगे तबतक केंद्र सरकार को अपने जनविरोधी निर्णयों को वापिस लेने के लिए भी बाध्य नहीं कर पाएंगे।

Wednesday, 30 December 2020

ऐ! नए साल




ऐ! नए साल

(संदीप कुमार) 




ऐ! नए साल

पिछले साल का हमने स्वागत किया था

शाहिन बाग आंदोलन में उठते नारों से
इस बार हम फिर से स्वागत कर रहे हैं
किसानों की बुलंद आवाज के साथ।

ऐ! नए साल
हमने, बीते साल खोए हैं अपने
चालीस से ज्यादा किसान साथी
जिनकी कुर्बानी व्यर्थ नहीं जाएगी
उनके लहू का रंग
हम सफेद नहीं होने देंगे।

ऐ! नए साल
हम लड़ेंगे तब तक
जब तक लहू का आखिरी कतरा
हमारी रगो में दौड़ता रहेगा
हम इसलिये भी लड़ेंगे
कि आने वाली पीढियां
गर्व से कह सकें
"हमारे पूर्वजों ने 
तानाशाह की आंखों में आंखें डालकर
सीधे-सीधे अपनी बातें कही
और तानाशाह के हर आदेश को
मानने से इनकार कर दिया।"

ऐ! नए साल
हम तो शांति से जीना चाहते हैं
हम बस यही चाहते हैं कि
कोई हमारे श्रम को न चुराए
हम चाहते हैं हमारे चेहरे देखकर
बच्चे चिंता की जगह, सिर्फ मुस्कुराएं
और जबतक हमारी मेहनत का पाई पाई
हमें नहीं लौटाया जाएगा
तबतक ये जंग जारी रहेगी।

ऐ! नए साल
आगाह करो तानाशाह को
ये शांति प्रिय जंग
कब अपने बचाव में हथियार उठा लेगी
कहा नहीं जा सकता
यह भी तय नहीं है कि कब ये जंग
खेत खलिहानों से होते हुए
जहर उगलती फैक्ट्रियों तक पहुंच जाएगी
और ये भी अंधेरे में है
कब ये नेतृत्व किसान-मजदूरों का 
सांझा नेतृत्व हो जाएगा।





किसान आंदोलन-3

 सही दुश्मन की पहचान कर ली है  किसान आंदोलन ने

(संजय कुमार)


(पंजाब में इस आंदोलन ने एक अलग ही शक्ल अख्तियार की है। पंजाब में जगह-जगह जिओ के टावरों को तोड़ा जा रहा है, उनकी लाइनें उखाड़ी जा रही हैं। अब तक पंजाब में 1500 से अधिक जिओ के टावर ध्वस्त किए जा चुके हैं। लाखों लोग जिओ से अन्य कम्पनियों में अपना सिम पोर्ट करा चुके हैं। अपने नुक्सान से घबराकर जिओ को ट्राई में शिकायत करनी पड़ी कि एयरटेल व वोडाफोन उसके खिलाफ दुष्प्रचार कर रही हैं। अम्बानी अडानी व रामदेव की कम्पनियों के खिलाफ लोगों में बेहद गुस्सा है।)




देश भर में किसानों का आक्रोश अपने शिखर पर है। किसानों ने दिल्ली की सीमाओं पर आकर घेरा डाला हुआ है जिसमें सभी राज्यों के किसान शामिल हो रहे हैं। इसकी शुरुआत पंजाब-हरियाणा के किसानों ने की। उसी पंजाब-हरियाणा की धरती के बाशिंदों ने जो हर विदेशी हमलावरों को दिल्ली पर हमला करने से पहले ललकारते रहे हैं। पंजाब में तो यह एक सामाजिक-सांस्कृतिक जनांदोलन बन चुका है और हर धर्म, हर जाति, हर तबके के लोग इसका हिस्सा बन चुके हैं। पंजाब के हर घर से कोई न कोई दिल्ली मोर्चे पर डटा है और रोजाना सैंकड़ों, हजारों ट्रैक्टर-ट्रालियां दिल्ली कूच कर रही हैं। 
पंजाब में इस आंदोलन ने एक अलग ही शक्ल अख्तियार की है। पंजाब में जगह-जगह जिओ के टावरों को तोड़ा जा रहा है, उनकी लाइनें उखाड़ी जा रही हैं। अब तक पंजाब में 1500 से अधिक जिओ के टावर ध्वस्त किए जा चुके हैं। लाखों लोग जिओ से अन्य कम्पनियों में अपना सिम पोर्ट करा चुके हैं। अपने नुक्सान से घबराकर जिओ को ट्राई में शिकायत करनी पड़ी कि एयरटेल व वोडाफोन उसके खिलाफ दुष्प्रचार कर रही हैं। अम्बानी अडानी व रामदेव की कम्पनियों के खिलाफ लोगों में बेहद गुस्सा है।
दरअसल किसानों को यह समझ आ गया है कि सरकार अम्बानी-अडानी जैसे चंद बड़े पूंजीपतियों के हितों के लिए यह कृषि कानून लेकर आयी है और उन्हीं के दबाव में इतनी हठधर्मिता दिखा रही है। सरकार जब एक देश, एक मार्किट की बात करती है तो यह सब पूंजीपतियों को ही फायदा पहुंचाता है क्योंकि अलग कानून और अलग बाजार व्यवस्था व टैक्स सिस्टम बड़े पूंजीपतियों के लिए सिरदर्दी का काम है और छोटे स्थानीय व्यापारी के फायदे में हैं। अगर बड़े पूंजीपति को देश के पूरे बाज़ार पर कब्जा करना है तो उसे पूरे देश में एक जैसा ढांचा चाहिए। कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर के शब्दों में मनमोहन सरकार भी ऐसा करना चाहती थी लेकिन वह यह दबाव नहीं झेल पाई। लेकिन मोदी सरकार आर्थिक सुधारीकरण की दिशा में हर जनदबाव को दरकिनार करते हुए तेजी से आगे बढ़ रही है यही कारण है कि हर सार्वजनिक विभाग का तेजी से निजीकरण किया जा रहा है। रेलवे को भी निजी हाथों में दे दिया गया तो एयरपोर्ट भी अम्बानी-अडानी को दे दिए गए। अब देश के सबसे बड़े कृषि सेक्टर पर बड़े पूंजीपतियों की गिद्ध दृष्टि जमी हुई है और पूंजीपतियों को इसमें अपार संभावनाएं दिखाई दे रही हैं। यही कारण है कि अडानी ने बड़ी रेल लाइनों के किनारे अरबों रुपये का निवेश कर बड़े भंडारगृहों का निर्माण किया है। सरकारी सहयोग और सरकार द्वारा कौड़ियों के भाव सरकारी उपक्रम दिए जाने से जहाँ लॉकडाउन के बावजूद इनकी सम्पत्ति में भारी उछाल हुआ वहीं कुछ दिनों के बहिष्कार से ही अम्बानी बड़े दस धनकुबेरों की लिस्ट से बाहर हो गया।
लेकिन उनकी इस योजना को किसानों ने पलीता लगा दिया है। पंजाब में दशहरे पर नरेंद्र मोदी और अम्बानी अडानी के पुतले फूंकने से शुरू हुआ यह आंदोलन रिलायंस के पेट्रोल पम्पों और उनके स्टोर के विरोध से अब उनके सिम पोर्ट करने से उनके टॉवर उखाड़ने तक पहुंच गया है तो समझना होगा कि अब यह आंदोलन कार्पोरेटपरस्त इस सरकार और उनके पूंजीपति आकाओं के तंबू उखाड़कर ही दम लेगा।

Friday, 25 December 2020

किसान आंदोलन-2

 वर्तमान किसान आंदोलन की उपलब्धियां

 (संजय कुमार)




(इस आंदोलन ने लोगों में एक नई ऊर्जा और उत्साह का संचार किया है। अब तक जो मोदी सरकार अपराजेय नजर आ रही थी, अब लोगों में एक नई आशा की किरण जगी है कि इस सरकार को भी झुकाया जा सकता है, इसे भी हराया जा सकता है। तमाम आंदोलनकारी संगठन, ताकतें, कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी एक मंच पर आकर हुंकार भर रहे हैं। इसी आंदोलन के दौरान बिहार के विधानसभा चुनाव हुए, हैदराबाद नगर निकाय, राजस्थान में पंचायतों व जम्मू कश्मीर में जिला विकास निगम के भी चुनाव हुए जिनमें बीजेपी ने बाजी मारी और उसने यह कहना शुरू कर दिया कि लोगों ने इन बिलों के पक्ष में भाजपा को जिताया है जिस कारण इस आंदोलन ने यह भी साबित किया है कि फासीवाद और उसकी वाहक भाजपा व संघ परिवार को संसदीय राजनीति के जरिये नहीं हराया जा सकता बल्कि जनसंघर्षों के माध्यम से ही फासीवाद पर मरणांतक चोट की जा सकती है।)


देश भर में मोदी सरकार द्वारा कोरोना काल में जबरदस्ती थोपे गए तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ जबरदस्त रोष है। इन कानूनों के वापस लिए जाने की मांग को लेकर पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान के किसान दिल्ली आने वाले सभी राजमार्गों को एक महीने से घेरकर बैठे हैं। इनके अलावा उत्तराखंड, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र व अन्य राज्यों के किसान भी दिल्ली आकर धरने पर बैठे हैं व देश के अनेक हिस्सों में किसान जिला व ब्लॉक स्तर पर मोर्चा लगाए बैठे हैं। 
जहाँ सरकार कारपोरेट घरानों के दबाव में किसानों की मांगें मानने को बिल्कुल तैयार नहीं दिखती वहीं किसान भी पूरी तैयारी के साथ दिल्ली आए हैं और अपनी बातें मजबूत तर्कों के साथ रख रहे हैं, यह आंदोलन स्थल पर बखूबी देखा जा सकता है। चाहे वह दिन रात चलने वाले लंगर हों, सर्दी और ओस से बचाव करने वाले टैंट हों, कपड़े धोने की मशीनें, पानी गर्म करने की मशीनें हों या खाना बनाने वाली मशीनें, डॉक्टरी सुविधाएं सबकुछ बहुत ही मैनेजमेंट के साथ चल रहा है। बल्कि अब तो धरनास्थल पर ही स्कूल, लाइब्रेरी भी खुल गए हैं। किसानों का कहना है कि वे अपने साथ कम से कम 6 महीने का राशन लेकर आये हैं और उन्हें अब तक अपना राशन खोलने की जरूरत नहीं पड़ी क्योंकि नजदीकी गांवों से ही इफरात में दूध, लस्सी व अन्य खाद्य सामग्री सहयोग के तौर पर पहुंचाई जा रही है।
इसका अर्थ यह है कि किसान भी सरकार से आर पार की लड़ाई के मूड में हैं। इस आंदोलन का परिणाम चाहे जो भी हो लेकिन इस आंदोलन ने देश-विदेश की राजनीति और जनता में बड़ी हलचल मचा दी है। कनाडा के प्रधानमंत्री तक को किसान आंदोलन के पक्ष में बयान देना पड़ा। मोदी सरकार के सत्तारूढ़ होने के बाद अपनी सम्पत्ति में अकूत उछाल देखने वाले कारपोरेट घराने अडानी को फुल पेज के विज्ञापन जारी कर सफाई देनी पड़ी है। आंदोलनकारी किसानों को खालिस्तानी, माओवादी, अतिवादी, चीनी साजिश का शिकार, कांग्रेसी, विपक्षी दलों के बहकाये गए बताने के सभी हथकंडे बेकार गए हैं। प्रायोजित किसान सम्मेलनों व किसानों द्वारा सरकार के पक्ष में ज्ञापन दिलवाकर आंदोलन में फूट डालने की कोशिशें भी काम नहीं कर पाई हैं।
हरियाणा, उत्तरप्रदेश की भाजपा सरकारों द्वारा पुलिस के इस्तेमाल, बैरिकेड, वाटर कैनन, आंसू गैस के गोले भी किसानों को दिल्ली की तरफ बढ़ने से नहीं रोक पाए। झक मारकर सरकार को किसानों को बातचीत की मेज पर बुलाना ही पड़ा।
पहली बार सरकार कुछ-कुछ झुकती दिखाई दे रही है। अब तक CAA, NRC के मुद्दे पर शाहीन बाग, रोहित वेमुला की आत्महत्या के मुद्दे पर, स्टूडेंट्स मुद्दों पर अनेकों देशव्यापी आंदोलन हुए लेकिन सरकार ने उन्हें मुस्लिमों का या टुकड़े टुकड़े गैंग के विरोध बताकर खारिज कर दिया। हालांकि सरकार द्वारा पहले इस आंदोलन को भी ऐसे ही खारिज करने की कोशिशें की गई लेकिन उन्हें मजबूरन किसान संगठनों को वार्ता की मेज पर बुलाना ही पड़ा और गृह मंत्री अमित शाह को बातचीत की कमान संभालनी पड़ी। 

इस आंदोलन ने काफी उपलब्धियां भी प्राप्त की हैं और बहुत कुछ सीखाया है जिसे याद रखना बहुत जरुरी है।

1. फासीवाद पर चोट -: पहली बार फासीवाद के खिलाफ एक बड़ा सयुंक्त मोर्चा कायम होता दिखाई दे रहा है। इस आंदोलन में सभी वर्गों, जातियों और धर्मों के लोगों ने जो एकजुटता दिखाई है, जिससे संघ परिवार को अपनी नींव हिलती दिखाई देने लगी है। उत्तर भारत में फासीवाद का मजबूत आधार बड़ा किसान, आढ़ती व व्यापारी भी आज उसके खिलाफ मजबूती से खड़ा है। इतने सालों बाद पहली बार स्वतस्फूर्त रूप से देशव्यापी बंद हुआ है।
2. हरियाणा पंजाब भाईचारा -: जहां इस आंदोलन की शुरुआत पंजाब के किसानों द्वारा हुई वहीं हरियाणा के किसान भी बड़ी संख्या में इस जत्थेबंदी में जुड़े और जगह-जगह पंजाब-हरियाणा भाईचारे के बैनर लहराए जा रहे हैं। 1966 में पंजाब से अलग होकर हरियाणा के बनने के समय से ही राजधानी पंजाब और सतलुज के पानी के बंटवारे को लेकर व अन्य कुछ मुद्दों पर पंजाब-हरियाणा में विवाद रहा है, लेकिन इस आंदोलन में दोनों प्रदेशों की जनता सभी मतभेद बुलाकर कंधे से कंधा मिलाकर साथ खड़ी है। जहाँ मोर्चे पर पंजाब के सिक्ख किसान ज्यादा है, वहीं हरियाणा के सभी गांवों से उनके लिए भोजन और अन्य सहयोग आ रहा है। सरकार ने इस भाईचारे को तोड़ने के लिए SYL का मुद्दा उछालने की भी कोशिश की लेकिन भाजपा सरकार अपने इस मनसूबे में नाकामयाब रही बल्कि किसनों ने इसे फ्लॉप कर दिया। 
3. असली दुश्मन कारपोरेट पर चोट -: इस आंदोलन ने जनता के असली दुश्मन और मोदी के सरपरस्त कारपोरेट जगत को जनता के सामने नंगा कर दिया। लोग अम्बानी, अडानी के विरोध में खुलकर आये और उनके बहिष्कार की मुहिम देशव्यापी मुहिम बन गई। यहाँ तक कि अडानी को अखबारों व मीडिया में फुल पेज के विज्ञापन देकर सफाई देनी पड़ी। अम्बानी ने भी अपने कस्टमर कम होने के लिए वोडाफोन और एयरटेल पर आरोप लगाए। अडानी के गुंडों ने करनाल के पत्रकार आकर्षण उप्पल पर हमला करवाया जिससे वह और ज्यादा बेनकाब हुआ। पहली बार किसानों ने टोल फ्री करवाकर कारपोरेट पर चोट की।
4. महिलाओं की भागीदारी -: दूरी होने के बावजूद आंदोलन में बड़ी संख्या में महिलाओं की भागीदारी है। 70 साल की बुजुर्ग औरतें भी पंजाब से जीप चलाकर दिल्ली पहुंची हैं। महिलाओं की जरूरतों का इस आंदोलन में पूरा ध्यान रखा जा रहा है। उनके लिए अलग बाथरूम से लेकर शौचालय व सेनेटरी पैड तक का बंदोबस्त किया गया है। पुरुषों द्वारा गोल रोटी बनाना व खाना बनाना सीखना एक सुखद बयार की तरह है, जिससे उन्हें घर के काम का महत्व पता चलेगा। इस तरह यह आंदोलन महिला-पुरुष समानता की दिशा में भी एक कदम है। महिला किसानों का कांसेप्ट, उनकी समस्याएं भी यह आंदोलन उठा रहा है।
5. नौजवानों की चेतना -: पंजाब का नौजवान हमेशा ही सामाजिक चेतना और क्रांतिकारी चेतना का वाहक रहा है। मुगल शासन के अत्याचारों के खिलाफ गुरु तेग बहादुर और उनके साहबजादों ने अपनी शहादत दी, आजादी की लड़ाई में करतार सिंह सराबा हो या शहीदे आजम भगत सिंह, नक्सलबाड़ी आंदोलन में भी पंजाब के नौजवानों ने बढ़ चढ़कर कुर्बानियां दी हैं, खालिस्तान के धार्मिक उन्माद के खिलाफ भी अवतार सिंह पाश सरीखे कवि ने अपनी शहादत दी। लेकिन पिछले कुछ समय से पंजाब की युवा पीढ़ी नशे और साम्राज्यवादी पॉप कल्चर की गिरफ्त में थी लेकिन इस आंदोलन ने उसे एक गहरी नींद से जगाने का काम किया है। आज वे आंदोलन में एक जुझारु भूमिका निभा रहे हैं वहीं करपोरेटवाद, साम्राज्यवाद व सरकारी जुल्म के खिलाफ गीतों, नारों व नाटकों के माध्यम से एक नई संस्कृति का भी निर्माण कर रहे हैं।
6. गजब का प्रबन्धन -: अलग अलग किसान यूनियनों के किसान और लाखों की भीड़ होने के बावजूद आन्दोलनस्थल पर गजब का अनुशासन और प्रबन्धन देखने को मिल रहा है। एक महीना से ज्यादा होने और दिल्ली की हाड़ कंपा देने वाली ठंड के बावजूद किसी तरह की कोई हड़बड़ी और अव्यवस्था नहीं है। हर व्यक्ति की जरूरतों का पूरा ध्यान रखा जा रहा है। इतने लोगों के होने के बावजूद साफ सफाई का पूरा ध्यान है। अलग अलग विचारों की मतभिन्नता के बावजूद किसान जत्थेबंदियों में आंदोलन को लेकर एकता है और सभी को उचित स्पेस मिल रहा है तभी सरकार आंदोलन में कोई फूट नहीं डाल पाई है हालांकि सरकार ने अलग अलग यूनियनों को बुलाकर ऐसा करने की भरपूर कोशिश की।
7. किसानों की राजनैतिक चेतना -: इस आंदोलन ने किसानों की राजनैतिक चेतना को प्रमुखता से बढाने का काम किया है। जहाँ किसान नेता तीनों कानूनों के हर क्लाज को इतने अच्छे से सरकार के सामने रख रहे हैं कि सरकार को इतने संसोधन लेकर सामने आना पड़ा कि किसानों ने तीनों कानूनों को रद्द कर ही वार्ता आगे बढाने की मांग कर दी है। वहीं आंदोलन में शामिल किसी भी किसान से बात कर लो वही हर कानून की धज्जियां उड़ाकर रख देता है। मीडिया वाले जानबूझकर ऐसे किसानों से बातचीत करने की कोशिश करते हैं जिसे उनकी समझ से कुछ न पता हो ताकि वे यह दिखा सके कि ये किसान बहकाकर लाये गए हैं लेकिन उन्हें निराश ही होना पड़ता है।

किसान आंदोलन की कमजोरियां -:

हर आंदोलन की कुछ न कुछ कमजोरियां भी जरूर होती हैं, वही इस आंदोलन के भी साथ है।
 
1. सामंती धनी किसानों के हाथ में नेतृत्व -:
यह आंदोलन की सबसे बड़ी कमजोरी है कि इसका नेतृत्व किसी क्रांतिकारी कम्युनिस्ट पार्टी के हाथ में न होकर सामंती धनी किसानों के हाथ में है व इसे आढ़तियों व जमींदारों का समर्थन प्राप्त है क्योंकि उनके हित इससे पूरी तरह गुंथे हुए हैं। लेकिन यह इस आंदोलन की कमजोरी न होकर कम्युनिस्ट पार्टी की कमजोरी है कि वह अपनी कमजोर ताकत के चलते इसकी अगुआ नहीं बन पाई। देश में कम्युनिस्ट आंदोलन बिखराव व विभ्रम का शिकार है, इसलिए आगे बढ़कर इस ऊर्जावान आंदोलन को नेतृत्व नहीं दे पा रहा है। हालांकि कई सारे कम्युनिस्ट जन संगठन व कार्यकर्ता इस आंदोलन में पूरी शिद्दत से लगे हुए हैं।
2. मजदूरों की भागीदारी -: इन कानूनों में जमाखोरी से सम्बंधित तीसरे कानून का सबसे घातक असर मजदूर और आम आदमी पर पड़ने वाला है क्योंकि आलू-प्याज की एकदम से बढ़ी हुई कीमतों के रूप में हम यह देख चुके हैं। लेकिन अभी यह आंदोलन किसानों तक ही सीमित है और बड़े पैमाने पर मजदूरों को नहीं जोड़ पाया है। बेशक मारुति वर्कर्स यूनियन और सोनीपत के मजदूर अधिकार संगठन के बैनर तले मजदूरों ने आंदोलन में भाग लिया है, लेकिन व्यापक स्तर पर मजदूरों की भागीदारी और उनके नेतृत्व में ही यह आंदोलन कामयाब हो सकता है। इसलिए मजदूर संगठनों और उनकी पार्टियों की यह महती जिम्मेवारी बनती है कि वे इन कानूनों के दुष्प्रभावों को मजदूरों के बीच लेकर जाएं और इस आंदोलन में बड़ी संख्या में शिरकत सुनिश्चित करें।
इस आंदोलन ने लोगों में एक नई ऊर्जा और उत्साह का संचार किया है। अब तक जो मोदी सरकार अपराजेय नजर आ रही थी, अब लोगों में एक नई आशा की किरण जगी है कि इस सरकार को भी झुकाया जा सकता है, इसे भी हराया जा सकता है। तमाम आंदोलनकारी संगठन, ताकतें, कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी एक मंच पर आकर हुंकार भर रहे हैं। इसी आंदोलन के दौरान बिहार के विधानसभा चुनाव हुए, हैदराबाद नगर निकाय, राजस्थान में पंचायतों व जम्मू कश्मीर में जिला विकास निगम के भी चुनाव हुए जिनमें बीजेपी ने बाजी मारी और उसने यह कहना शुरू कर दिया कि लोगों ने इन बिलों के पक्ष में भाजपा को जिताया है जिस कारण इस आंदोलन ने यह भी साबित किया है कि फासीवाद और उसकी वाहक भाजपा व संघ परिवार को संसदीय राजनीति के जरिये नहीं हराया जा सकता बल्कि जनसंघर्षों के माध्यम से ही फासीवाद पर मरणांतक चोट की जा सकती है।

Wednesday, 16 December 2020

किसान आंदोलन कविताएं-2

 1. किसान 

(गौहर रजा)




तुम किसानों को सड़कों पे ले आए हो 
अब ये सैलाब हैं 
और सैलाब तिनकों से रुकते नहीं 

ये जो सड़कों पे हैं 
ख़ुदकशी का चलन छोड़ कर आए हैं 
बेड़ियां पाओं की तोड़ कर आए हैं 
सोंधी ख़ुशबू की सब ने क़सम खाई है 
और खेतों से वादा किया है के अब 
जीत होगी तभी लौट कर आएंगे 

अब जो आ ही गए हैं तो यह भी सुनो 
झूठे वादों से ये टलने वाले नहीं 

तुम से पहले भी जाबिर कई आए थे 
तुम से पहले भी शातिर कई आए थे 
तुम से पहले भी ताजिर कई आए थे 
तुम से पहले भी रहज़न कई आए थे 
जिन की कोशिश रही 
सारे खेतों का कुंदन, बिना दाम के 
अपने आकाओं के नाम गिरवी रखें 

उन की क़िस्मत में भी हार ही हार थी 
और तुम्हारा मुक़द्दर भी बस हार है 

तुम जो गद्दी पे बैठे, ख़ुदा बन गए 
तुम ने सोचा के तुम आज भगवान हो 
तुम को किस ने दिया था ये हक़, 
ख़ून से सब की क़िस्मत लिखो, और लिखते रहो 

गर ज़मीं पर ख़ुदा है, कहीं भी कोई 
तो वो दहक़ान है,
है वही देवता, वो ही भगवान है 

और वही देवता,
अपने खेतों के मंदिर की दहलीज़ को छोड़ कर 
आज सड़कों पे है 
सर-ब-कफ़, अपने हाथों में परचम लिए
सारी तहज़ीब-ए-इंसान का वारिस है जो 
आज सड़कों पे है 

हाकिमों जान लो। तानाशाहों सुनो 
अपनी क़िस्मत लिखेगा वो सड़कों पे अब 

काले क़ानून का जो कफ़न लाए हो 
धज्जियाँ उस की बिखरी हैं चारों तरफ़ 
इन्हीं टुकड़ों को रंग कर धनक रंग में 
आने वाले ज़माने का इतिहास भी 
शाहराहों पे ही अब लिखा जाएगा।

तुम किसानों को सड़कों पे ले आए हो 
अब ये सैलाब हैं 
और सैलाब तिनकों से रुकते नहीं 

2. मैं उनकी कविता होना चाहती हूँ

(रंजीत वर्मा)


वह आज फिर सिंघु बॉर्डर जाने की 
ज़िद पर अड़ी थी
कल जब वह लौटी थी
तो पाँव में पुराना दर्द लेकर लौटी थी
बावजूद इसके वह आज फिर
सिंघु बॉर्डर जाने को खड़ी थी
वह अंतिम छोर तक जाना चाहती थी
जहाँ घंटों चलने के बाद भी वह
कल नहीं पहुंच पाई थी
जब लौटी थी तो बेहाल हो चुकी थी
तभी उसने ठान लिया था कि 
कल वह फिर जाएगी
और इस बार चाहे जो हो
अंतिम छोर तक जाएगी

उसे नहीं मालूम था
कि कल वह जिस अंतिम छोर तक नहीं जा सकी थी
वह अंतिम छोर आज
आठ किलोमीटर और दूर चला गया है
और आज जब वह वहाँ पहुंचने को चलेगी 
तब तक वह अंतिम छोर 
हो सकता है कि
भगत सिंह के फांसी के फंदे को चूमता
उसके आगे निकल जाए
बॉर्डर की उस रेखा के पार निकल जाए
जो हिंदू को मुस्लिम को सिख को ईसाई को
एक-दूसरे से अलग करती है

पति ने समझाया कि अब असंभव है तुम्हारे लिए
अंतिम छोर देख पाना
उसका अंत अब कहीं नहीं है

उसने कहा जहाँ थक जाऊंगी
वहाँ मुझे बैठा देना
जहाँ आसपास कविताएं पढ़ी जा रही हो
गीत गाए जा रहे हों
जहाँ लोग अनशन में बैठे हों
वहीं मुझे भी बैठा देना
मैं उनके बीच उनकी कविता होना चाहती हूँ
उनका झूमता नाचता गीत होना चाहती हूँ
मैं उनकी भूख की आग होना चाहती हूँ
तुम अंतिम छोर देखकर आना
और मुझे पूरा हाल ठीक-ठीक बताना
मैं वहाँ सबसे पीछे खड़ी होकर उन्हें देखना चाहती हूँ

तुम कुछ सुन रहे हो हुक्मरान
समझ रहे हो कुछ
क्या कह रही है वह
और तुम सोचते हो कि
गोलमेज पर तुम किसान का हल निकाल लोगे
अपने कक्ष के गोलमेज पर तो तुम 
उनका हाल भी नहीं जान सकते
हल क्या निकालोगे
जाना होगा तुम्हें सिंघु बॉर्डर के अंतिम छोर पर खड़े
किसान तक
एक स्त्री की चिंता में वह कैसा दिखता है
पहले तुम्हें यह जानना होगा
फिर उसके बाद ही हल निकालने की सोचना।

3. धर्मवीर सिंह

विश्व का सबसे बड़ा साम्राज्य
विश्व के सबसे बड़े खेत से 
ज्यादा बड़ा नहीं हो सकता। 

इतिहास का कोई भी 
सम्राट 
अपने युग के किसान से 
ज्यादा जरूरी नहीं हो सकता।। 

4. देवेन्द्र सिंह

नीरो ने दीयों की आग से सब्र किया
शहर के भट्ठी हो जाने को
सुलगाया है उसने जो
चिंगारी इन्हीं दीयों के भीतर से हो
किसान से खालिस्तान
फिर हिन्दू
फिर सिख
फिर ज़ात
फिर सरहद
अनेक दरारों से होती
दहका देगी
मुल्क को
एक बार फिर
दंगो में,

चैन से फिर वो
बंसी बजाएगा या
सुनाएगा मन की बात
यह उसके
आका 
मार्केटिंग एजेंसियों से मिल
तय कर देंगे।

5. ललकार

( हरभगवान चावला )

क्या यह ज़रूरी है
कि ढोरों के बीच रह रहा आदमी
ख़ुद ढोर हो जाए?
यह भी ज़रूरी नहीं
कि मिट्टी जोतता आदमी
ख़ुद मिट्टी हो जाए
या कँटीली झाड़ियों को काटते हुए
आदमी की देह पर काँटे उग आएँ
किसान आदमी ही होता है
तुम्हारी तरह हाड़-मांस से बना
उसे भी भूख लगती है
पेट पर लात पड़ती है
तो उसे भी गुस्सा आता है
तुम कहते हो
किसान आसमानी बातें करता है
वह जानता नहीं कि
जिन्हें वह ललकार रहा है
वे बहुत ऊँचे लोग हैं
वह अच्छी तरह जानता है
शत्रु को पहचानता है
वह इन्सानियत को मानता है
पर साँपों का फन कुचलना जानता है
तुम भी यह जान लो-
इमारत कितनी भी ऊँची हो
आसमान से नीची ही रहती है।

6. तैयारी पूरी हो चुकी है
( सुशील मानव )

नहीं, उन्हें तुम नहीं 
तुम्हारे खेत चाहिए 
वो तो चाहते ही हैं 
कि छोड़ दो तुम घाटे का सौदा 
ताकि वो इसमें मुनाफा कमा सकें 
उनका लक्ष्य ही है अनब्रांड 
फल,सब्जी और अनाज से हमें मुक्त करना 
वैसे जैसे पानी की ब्रांडिंग की उन्होंने 
वैसे जैसे चाय की ब्रांडिंग की उन्होंने 
वैसे जैसे कपड़े की ब्रांडिंग की उन्होंने और गायब कर दिये 
हमारे गली मोहल्लों से टेलर 
वैसे ही अनाज की ब्रांडिंग करने के लिए 
वो गायब कर देंगे एक रोज तुम्हें भी, 
ओ किसानों!
ताकि हर थाली में परोस सकें वो 
पतंजलि, रिलायंस और अडानी 
विल्मार के दाल,चावल और रोटी 
उनकी तैयारी पूरी हो चुकी है 
तुम्हें गाँव से खींचकर शहर लाने की।

ठीक बुआई से पहले नोटबंदी ऐसी ही एक साजिश थी 
जानबूझकर रखा जाएगा न्यूनतम 
तुम्हारे फसलों का समर्थन मूल्य 
समय से नहीं किया जाएगा तुम्हें 
तुम्हारी फसलों का भुगतान 
गायब कर दिए जाएँगे बाजार से उर्वरक,कीटनाशक और बीज 
ऐन बुआई से पहले 
जीएम बीज एक ऐसी ही साजिश थी 
कि बोओगे उम्मीद और उगेगें आँसू 
जहाँ बैंक तुम्हें आसानी से दे देंगे कर्ज 
वहाँ तुम्हारे खेतों की नीलामी का जिम्मा बैंकों के हाथ होगा 
जहाँ बैंक नहीं देंगे कर्ज वहाँ अडानी,अंबानी के हाथों
तुम्हारे खेतों की नीलामी का जिम्मा 
गाँव के सेठों,साहूकारों , दबंगों का होगा 
खरीद लिए गए हैं सारे संस्थान 
खरीद ली गई हैं वोटिंग मशीनें 
अब कई वर्षों तक नहीं बदलेंगी सरकार 
सबसे बड़े हत्यारे को दे दिया गया है टेंडर 
खेत और खलिहान खाली कराने का 
जबकि एवज में खोल दी गई है लूट की कमाई 
बड़े हत्यारे के नीचे कई मझोले हत्यारे 
मझोलों के नीचे छोटे हत्यारे कर दिए गए हैं तैनात 
हत्याओं का न्यायीकरण कर दिया जाएगा 
प्रतिरोध करने वाले किसान 
असमाजिक तत्व कहकर मारा जाएगा 
ठीक वैसे ही जैसे मारा जाता है 
प्रतिरोध करने वाले आदिवासियों को नक्सली बताकर 
तुम्हारे शान्तिप्रद प्रतिरोध को 
विपक्ष की साजिश बताकर 
गुमराह कर दिया जाएगा 
बड़े जन समूहों के समाज को 
ताकि समाज में न उपजे तुम्हारे प्रति समर्थन का भावबोध 
बिल्कुल वैसे ही जैसे वामपंथियों की साजिश बताने पर नहीं उपजता है 
तुम्हारे मन में सहानुभूति 
और समर्थन का भावबोध 
शांतिप्रद आदिवासी आंदोलनों के प्रति
विपक्ष की मरम्मत के लिए ही 
खोले व बनाए गए हैं 
कई हिंदू सेना व प्रकोष्ठ 
जिसमें भर्ती किए गए हैं किराए के बाउंसर 
'विपक्ष' दरअसल कोड है उनका 
विपक्ष- मुक्त माने प्रतिरोध मुक्त 
तो कौन है उनका असली विपक्ष 
दरअसल किसान और आदिवासी ही उनका मुख्य विपक्ष है 
जिसके पास जमीन और जंगल है 
उन्हें हमारी जमीन चाहिए 
उन्हें हमारे जंगल चाहिए 
आदिवासियों ने तो कब का शुरू कर दिया है अपना संघर्ष 
अब बारी हमारी, हम किसानों की है 
संकट अब हमारे अस्तित्व का है 
उनकी तैयारी पूरी हो चुकी है
अब करो या मरो 
मरो या करो।

Sunday, 6 December 2020

किसान आंदोलन - 1

 किसान आंदोलन - एक अवलोकन

(डॉक्टर प्रदीप)



देश की राजधानी इस वक्त एक अलग किस्म की सुनामी देख रही है। यह देखना बेहद सुखद है कि जब राजसत्ता अपने सर्वाधिक निरकुंश तौर तरीकों से विरोध के प्रत्येक स्वर को दबाने पर तुली थी, विरोध की हर आवाज को देश विरोध के नाम पर बदनाम करने की कोशिश कर रही थी, जब अधिकांश मीडिया भांडगिरी का चरम प्रदर्शन कर रहा था, ठीक उसी समय लाखों-लाख किसान जनविरोधी कानूनों को रद्द करवाने के लिए दिल्ली को घेरे खड़े हैं और हजारों की संख्या में किसान प्रत्येक दिन दिल्ली की ओर कूच कर रहे हैं। 

किसान कहीं दिल्ली न पहुंच जाएं, यह डर इतना ज्यादा था कि किसानों को रोकने के लिए जो हथकंडे सरकार द्वारा अपनाये गये, वो इस प्रकार के थे मानो किसी दुश्मन सेना का रास्ता रोका जा रहा हो। सडकों पर आठ-आठ फूट गहरी खंदकें खोद दी गई। बड़े-बड़े बोल्डर(पत्थर) सडकों पर डाल दिए गए। लेकिन किसानों की सुनामी को रोका नहीं जा सका। सरकारें कुछ सालों से इस मुगालते में राज कर रही हैं कि जो वो कर रही है, जो वो कह रही हैं, जनता उस सब को आंखें बंद करके स्वीकार कर लेंगी। 

जो तीन कृषि कानून सरकार ने लागू किए हैं, इनके बारे में सरकार ने किसी की राय ली? भाजपा के बिकाऊ प्रवक्ताओं ने मीडिया के सामने ताल ठोकी कि ये कानून बहुत विचार विमर्श व जन समुदाय से राय लेकर बनाए गए हैं और जनता इसका विरोध नहीं कर रही, केवल विपक्ष इसे अपनी राजनीति के लिए मुद्दा बना रहा है। लेकिन जल्दी ही उसके पूराने सहयोगी दल शिरोमणि अकाली दल ने इस मुद्दे पर एनडीए छोड़ दी, उसके एक और पुराने मित्र चौटाला ने नुक्ताचीनी शुरू कर दी। इसलिये नहीं कि अकाली दल व जजपा किसानों की हितैषी है। जब बिल पास हो रहे थे तो इनका समर्थन बाजपा को था। लेकिन इन कानूनों के जनता द्वारा जबरदस्त विरोध को देखते हुए इन्हें समझ में आ गया कि अगर उन्होंने अपनी पॉजिशन नहीं बदली तो जनता इन्हें गटर में फैंक देगी। सबसे बड़ी बात तो यह है कि इन कानूनों को बनाने से पहले आर.एस.एस. से जुड़े भारतीय किसान संघ से भी कोई राय नहीं ली गई, किसी ओर किसान संगठन से राय मशविरा करना तो बहुत दूर की बात है।

अगर अपने ही किसान संगठन से राय नहीं तो किसकी इच्छा से ये कानून बनाये गए और वे भी अध्यादेश के माध्यम से? मोदी सरकार को ऐसी क्या जल्दी पड़ी थी कि जब देश लॉकडाउन में फंसा हुआ था, सरकार ने अध्यादेश के द्वारा यह कृषि बदलाव करने का षड्यंत्र रचा? अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि ये तीनों कानून बड़ी कंपनियों की कृषि क्षेत्र में घुसपैठ और मुनाफे को सुनिश्चित करते हैं।

हर व्यक्ति जानता है कि फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य असल में अधिकतम मूल्य है जो किसानों को मिल पाता है। मात्र 6% फसल इस मूल्य पर बिक पाती है, बाकि 94% फसलें इस एमएसपी से 50% तक कम मूल्य पर बिकती हैं। जहां एमएसपी मिलता है, वो इलाके मुख्यतः पंजाब और हरियाणा में हैं जहां मंडी व्यवस्था कायम है। बाकि राज्यों में न मंडी है न एमएसपी है। इसमें कोई शक नहीं है कि मंडी व्यवस्था, कोई बेहतरीन व्यवस्था नहीं है। और यह भी सच्चाई है कि आढतियों ने किसानों को अपने कर्ज जाल में फंसा रखा है। नए कृषि कानून किसानों को आढ़तियों से भी बढ़ी जोंकों के शिकंजे में फंसाने का इंतजाम करते है। यह उम्मीद करना कि किसानों को मंडी से बाहर बेहतर रेट मिल सकते हैं, मूर्खता होगी। देश के किसी भी क्षेत्र में ऐसा नहीं हो पाया है। लेकिन इसकी इजाजत देकर कंपनियों का रास्ता जरूर साफ कर दिया है। अब अगर अंबानी व अडाणी कृषि उत्पाद खरीदने के लिए बाजार का रूख करेगा तो वह कोई 50-100 क्विंटल तो खरीदेगा नहीं। उनके पास हजारों टन की भण्डार क्षमता है। अभी तक कृषि उत्पाद आवश्यक वस्तुओं की श्रेणी में आते थे इसलिए एक मात्रा से अधिक कोई व्यक्ति/कंपनी ये खरीद नहीं सकती थी इसलिये दूसरे कृषि कानून की जरूरत पड़ी जहां जमाखोरी पर से सभी प्रतिबंध हटा लिए गए हैं। इसी से जुड़ा तीसरा कानून कांट्रेक्ट खेती से जुड़ा है। स्पष्ट है पूंजीपतियों को अपनी फैक्ट्रियों के लिए कच्चा माल चाहिए। कांट्रेक्ट खेती के द्वारा वो अपनी मर्जी का माल पैदा करने के लिए किसानों को बाध्य करेंगे। ब्रिटिश काल में नील की खेती करने वाले किसानों की दुर्दशा इतिहास के पन्नों में खूब दर्ज है। वर्तमान में भी अंतरराष्ट्रीय व राष्ट्रीय अनुभव यही बताते हैं कि कांट्रेक्ट खेती में घाटा हमेशा किसान को ही रहा है। खराब गुणवत्ता के नाम पर किसान की फसल सस्ते दाम पर खरीद ली जाती है। 

अंत: सरकार ने किसानों से राय करने के बाद नहीं बल्कि कारपोरेट जगत से बात करने के बाद ये कृषि कानून लागू किए गए। ये कानून केवल किसानों को ही प्रभावित नहीं करेंगे बल्कि देश कि 80% आबादी के लिए नुकसानदायक साबित होने वाले हैं क्योंकि आधे से ज्यादा आबादी प्रत्यक्ष तौर पर और एक चौथाई आबादी अप्रत्यक्ष तौर पर खेती से जुड़ी है। इसलिये देश के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य बनता है कि तीनों नए कृषि कानूनों को रद्द करने के लिए अपनी आवाज़ बुलंद करें। यह संघर्ष देश की जनता के अधिकारों का, कारपोरेट जगत की अंधी लूट की खिलाफत का संघर्ष है। 

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का एक अन्य आयाम भी है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सभी किसान संगठन स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने की बात कर रहे हैं, निस्संदेह होनी भी चाहिए लेकिन स्वामीनाथन आयोग तो जमीन के वितरण की, भूमि सुधारों की भी बात करता है। इस पर किसान संगठन चुप्पी साधे हैं। इस आंदोलन में कृषि क्षेत्र से जुड़ी आधी आबादी सिरे से गायब है। खेत मजदूर, भूमिहीन किसानों के लिए इस आंदोलन में कोई जगह नहीं है। किसान आंदोलन ने उन्हें अपने से दूर कर रखा है और यह इस आंदोलन की एक बहुत बड़ी कमजोरी है। जो वर्ग किसी भी कृषि संघर्ष की मुख्य ताकत होना चाहिए, वही हाशिये पर नजर आ रहा है। दूसरी ओर यहां आढ़तिए उत्पीड़ित के रूप में और मसीहा के रूप में पेश किए जा रहे हैं। सच्चाई तो यह है कि आढतिया पूराने सूदखोर का ही नया रूप है। (आढ़तिये ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सामंती सत्ता के प्रतीक हैं) किसानों को मंडी में आढतियों की लूट से मुक्ति चाहिए थी लेकिन वर्तमान आंदोलन आढतियों के समर्थन, सहयोग से चल रहा है। ग्रामीण क्षेत्र के संकट को दूर करने के लिए जरूरत तो आमूलचूल बदलाव की है जो नए कृषि कानूनों को रद्द कर पैबंद लगाने से दुरूस्त नहीं होगी। असल में कृषि कानूनों के विरोध के नाम पर कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा आदि संसदीय पार्टियों के बीच चल रही नूरा कुश्ती को भी समझने की जरूरत है। साल 1991 से आज तक के तीस सालों के दौरान देश का प्रत्येक राजनीतिक दल कभी न कभी सत्ता में रहा है। विपक्ष में रहते हुए जो पार्टियां विदेशी कंपनियों का पुरजोर विरोध करती नजर आती हैं, वही सत्ता में आते ही चुप्पी की चादर ओढ लेती हैं। आज कांग्रेस इन कानूनों का विरोध करती नजर आ रही है लेकिन अगर कांग्रेस सत्ता में होती तो उसी ने इन कानूनों को लागू करना था क्योंकि कांग्रेस हो या भाजपा, या कोई और पार्टी आर्थिक नीतियां साम्राज्यवादियों के ही इशारे से चल रही हैं। 

सार रूप में आढ़तियों व बड़े जमींदारों व धनी किसानों के सहयोग से चल रहा यह आंदोलन वर्गीय संरचना में कोई बदलाव नहीं करेगा। भूमि सुधारों के बिना , कृषि क्रांति के बिना भूमिहीनों, गरीब किसानों, खेत मजदूरों के जीवन में कोई बदलाव नहीं आएगा। लेकिन व्यापक जनमानस में प्रचंड साम्राज्यवादी हमले का प्रतिरोध करने की चेतना अवश्य पैदा करेगा और सत्ता के घमंड में चूर दिल्ली की सल्तनत को जनता की ताकत का अहसास दिलाएगा जो लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए बेहद जरूरी है।

Friday, 27 November 2020

कविता

 1. ऐलान 


हुआ है ऐलान
किसान देश की राजधानी दिल्ली नहीं आयेंगे !
उन्हें रोकने के लिए
लगाये हैं संगीनों के पहरे !
उन्हीं के बेटों-भतीजों-भाइयों को खड़ा कर दिया है
बंदूकें लेकर उनके ही सामने !




ये कौन हैं
जिसने किसानों को दिल्ली आने से रोकने का हुकुम सुनाया है ?
ये भारत माता की संतान तो नहीं हो सकते
ये भारत के लोग नहीं हो सकते
इनकी जड़ें भारत में होती तो ये जानते
भारत आदिकाल से किसानों का देश है
किसान ही इस देश की संस्कृति और सभ्यता हैं
किसान ही इसके व्रतों, त्योहारों और उत्सवों की परंपरा में हैं!

ये देश किसानों का है
लेकिन किसान मर रहे हैं
अभावों और कर्जों के बोझ तले
ये क़र्ज़ माफी का ढोंग कर
एक और बोझ डाल देते हैं किसानों पर
अहसान का !
शहरीकरण और उद्योग धंधों के नाम पर
इनकी ज़मीनें छीनी जा रही हैं जबरन
क़ानून के नाम पर
बेड़ियाँ और फंदे डाले जा रहे हैं
किसानों के पांवों और गले में
कि ये अपना प्रतिरोध भी दर्ज न कर सकें
इतिहास के पन्नों में!

लेकिन यह बात अच्छी तरह जान लो
अमीरों और बनियों के दलालों
किसान कमज़ोर नहीं होते
साहसी होते हैं
ये प्रकृति से भी नहीं डरते
जंगलों जानवरों से भिड़ना जानते हैं
पर्वतों का सीना चीर फसल उगाना आता है इन्हें
टेढ़े मेढ़े, उबड़ खाबड़, पथरीली, कंटीली ज़मीनों समतल बनाना जानते हैं ये.
जब तुम खून जमाती ठण्ड में रजाई ओढ़कर नींदें काट रहे होते हो
ये हंसिया से फसलें काट रहे होते हैं
कुदालों से खेतों में उगे घास निकाल रहे होते हैं
जब तुम जेठ की दुपहरी में
एसी में बैठकर जीवन के मज़े ले रहे होते हो
बिसलेरी पीते हुए जनता के लिए मीटिंगे करने का ढोंग कर रहे होते हो
किसान पाइन- नहर में ठहरे पानी पीकर
फसलों को खलिहान में ला रहे होते हैं.

किसानों ने तुम्हें जीने का आधार दिया था
अनाज दिया था टैक्स के रूप में
कि तुम उनकी रक्षा कर सको लुटेरों से
लेकिन 70 साल आते आते तुम खुद लुटेरे बन गए
तुम सेवक से सरकार
और किसान मालिक से प्रजा बन गए!
तुमने संविधान बनाते वक़्त भी किसानों के साथ धोखा किया
यह देश किसानों का है
कहते रहे सिर्फ़ ज़ुबानी
कागजों-दस्तावेजों में देश बनियों के नाम करते रहे
लुटेरों और डकैतों को भी
‘भारत के लोग’ कहकर बराबरी का हक दे दिया!
मिट्टी खोदकर अनाज उगाने वाले
और एसी में बैठकर तीन पांच करने वाले बराबर कैसे हो सकते हैं?
अनाज ज़रूरी है हर किसी के लिए
तो किसान का होना भी ज़रूरी होना चाहिए था हर जगह के लिए !

क़ानून बनाते हो तो पहले उद्योगपतियों से मीटिंगे करते हो
खी खी कर उनका मूत पीते हो 
सत्ता में बने रहने के लिए
और किसानों के साथ विकास और क़ानून के नाम पर छल करते हो
गोलियां चलवाते हो....!

बहुत हो गया
बहुत हो गया
किसानों के साथ जुर्म
किसानों ! अब जाग जाओ !
ये लोग तुम्हारी सरकार नहीं है
सेवक हैं,
जो बने बैठे हैं लुटेरे, शोषक और जोंक
ये जो घूम रहे हैं बेलगाम
इन्हें काबू में लाकर
मवेशियों की तरह बाड़े में बांधना ज़रूरी है.
नहीं तो याद रखो
ये एक दिन फसलों के साथ साथ खेत भी चर जायेंगे
फिर तुम्हारे
और तुम्हारे बच्चों के लिए
खेत की मिट्टी भी नही बचेगी!

- धनंजय कुमार
27/11/20

2. मैं भी रूबरू होना चाहती

मैं भी रूबरू होना चाहती 
उस पुलिस से 
जो रोटी नहीं 
हड्डियां चबाती हैं 

जो अपनी बेटी को सुला 
ज़ामिया पर हमले 
करने आती हैं 

जिसके बाप ने खेत 
गिरवी रख करवाई 
थी पुलिस की नौकरी 
आज वही किसान 
पर लाठिया बरसाती 
हैं 

मुझे रूबरू होना हैं उससे 
जो रात के अंधरे में 
बेटियो को जला देती हैं 
जो कानुन घूसेड़ देने 
की बात करती हैं 

मैं उन प्यादो 
के रूबरू होना चाहती 
हूँ जो मशगूल हैं 
हाकिम की 
जी हुजूरी में

- नंदिता मऊ

3. किसानों की पुकार

नए नियम से नए रूप से
नए रंग से नए ढंग से
खेती होगी
खेत का खलयान का रोना

बीज, खाद, पानी का रोना
गाय की हाय, बैल का रोना
घास, खली, भूसे का रोना
जमींदार की मार का रोना

गाली और फटकार का रोना
धर-पकड़ और बेगार का रोना
करज़े और ब्याज का रोना
बनिये और बजाज का रोना

इज़्ज़त और लाज का रोना
पटवारी की चाल का रोना
दंड राज परताल का रोना
साथी लाल बाल का रोना

आये दिन के काल का रोना
हर चीज़ और हर बात का रोना
जुग जुग से दिन रात का रोना
नहीं रहेगा, नहीं रहेगा।

दिन बदलेगा पाप कटेगा
साथी सब संताप कटेगा
अन्न खलयान से घर में आए
इसकी नौबत कब आती है

अब तक छाती फाड़ परिश्रम
करके जो कुछ फ़स्ल उगाई
वो गाढ़ी भरपूर कमाई
दो दिन अपने काम न आई

ऊपर ऊपर उड़ जाती थी
रह जाते भूके के भूके
रह जाते नंगे के नंगे
रह जाते करज़े में डूबे

जीवन कटता ब्याज चुकाते
जीवन अब कुछ होने को है
खेती, बाड़ी, बाग़ और जंगल
दूध, दही, घी नाज और फल

गाँव में जो दौलत उपजेगी
वो सबकी सब अपनी होगी
अब ये दुर्व्यवहार मिटेगा
अब ये अत्याचार मिटेगा

चालाकी में धौंस- धाँस में
दल्लालों की फोड़ -फाँस में
फुसलाने में बहकाने में
डरवाने में धमकाने में

लुट्टस- पिट्टट्स की हलचल में
धन्ना सेठ के छल बल कल में
चतुर किसान नहीं आएगा
वो अपना हिस्सा, अपना हक़

लेके रहेगा, लेके रहेगा
जीके रहेगा, मरके रहेगा
लेकिन अब कुछ करके रहेगा

हर बीघा में हर एकड़ में
पैदावार आठ गुनी होगी
भूक मिटेगी और घर-घर में
अन्नपूर्णा बास करेगी।

- फ़िराक़ गोरखपुरी


4. नयी खेती




मैं किसान हूँ
आसमान में धान बो रहा हूँ
कुछ लोग कह रहे हैं
कि पगले! आसमान में धान नहीं जमा करता
मैं कहता हूँ पगले!
अगर ज़मीन पर भगवान जम सकता है
तो आसमान में धान भी जम सकता है
और अब तो दोनों में से कोई एक होकर रहेगा
या तो ज़मीन से भगवान उखड़ेगा
या आसमान में धान जमेगा।

- रमाशंकर "विद्रोही"

5. देशद्रोही

पहले पहल आदिवासी 
अपनी जमीन की सुरक्षा में खड़े हुए
बिकाऊ मीडिया ने
उन्हें देशद्रोही का तमगा दिया
और आदिवासियों के खिलाफ
तनी बंदूक को जायज ठहरा दिया।

अब किसान उठ खड़े हुए हैं
और मीडिया भी उठ खड़ी हुई है
देशद्रोही ठहराने के लिए
किसानों के खिलाफ
खड़ी कर दी है पुलिस-फौज
बंदूक गोलों के साथ

इन्हें भ्रम है 
अपने गोले बारूद पर
लेकिन इतिहास गवाह है
जनता जब जब उठ खड़ी हुई है
तानाशाहों को कुर्सियां छोड़नी पड़ी हैं।

- संदीप कुमार

6. 

मरता है किसान तो मरने दो,
कोई सुशांत थोड़ी है, 
उजड़ता है खेत खलियान उजड़ने दो, 
कोई कंगना का मकान थोड़ी है। 


- जयंत प्रकाश

Friday, 20 November 2020

सुनो मेरी कहानी-मेरी जुबानी

 यह पुस्तक एक बहादुर बोलीवियाई मजदूर औरत डोमितिला बारिओस डि चुन्गारा के जीवन संघर्ष की कहानी है। एक साधारण महिला की असाधारण कहानी। इस पुस्तक का अनुवाद अमिता शीरिन ने किया है जो बहुत ही आसान शब्दों में है और पाठक को बांधकर रखता है।






https://drive.google.com/file/d/19FRYwTxSJnhc_XPO43gJfj89pIXLU84h/view?usp=drivesdk

Thursday, 12 November 2020

कविता

 अभय वसीयत..!


(अभय सिन्हा, सबौर, भागलपुर)

मैं अपने देश का एक अनाम नागरिक..!
अपनी अंतरात्मा को साक्षी मानकर..!
पूरे होशो-हवास में अपनी वसीयत, 
लिख रहा हूँ ताकि सनद रहे..! 
मेरे पास किसी को देने के लिए,
खुद के अलावा और है क्या..?
(सम्पत्ति किसकी रही है, किसकी रहेगी..?) 

मैं मरणोपरांत अपनी आंखें,
दे देना चाहता हूँ कानून को..!
ताकि कल कोई ये न कहे,
कि कानून अंधा होता है..!
मैं खोल देना चाहता हूँ..!
न्याय की देवी की आंखों पर बंधी पट्टियाँ..!
ताकि वह खुद देख सके..!
रोटी चुराने वाले के भूख का दर्द..!
और पूरे समाज का हिस्सा, 
चुराने वाले की हवस में क्या फर्क है..? 
फैसले बहुत हो चुके..!
अब इंसाफ करने का वक्त है..! 




मैं अपने कान दे देना चाहता हूँ दीवारों को,
ताकि यह बात सिर्फ़ कहावत तक न रहे..!
दीवारें सुन सकें बंद कमरे में होने वाली,
देश को बेच डालने वाली दुरभिसंधियां..!
या किसी मजलूम के 
खिलाफ होने वाली सरगोशियाँ..!
किसी बेबस की चीख सुनकर,
मन तड़प जाये तो सुन आये..! 
जाकर उखड़ी किवाड़ के पीछे,
आदम और हव्वा की खुसुर-पुसुर..!

मैं अपनी नाक दे देना चाहता हूँ..!
उस अभागे पिता को,
जिसकी नाक कट चुकी है..!
उसे देखकर, पड़ोसी अनदेखा कर जाते हैं..!
उसकी पत्नी और छोटी बेटी को,
लोग देखते हैं अश्लील नजरों से..!
क्योंकि उसकी युवा बेटी ने
इंकार कर दिया है दमघोंटू विषैले धुएं से..!
अपना आशियाना बना लिया है उसने,
इन्द्रधनुष के पार अपने प्रेमी के साथ..!

मैं अपने हाथ दे देना चाहता हूँ..!
ट्रैफिक सिग्नल पर बैठे, 
उस भिखारी लड़के को जो, 
अपने टुंडे हाथों से खिसकाता है, 
चिल्लर और नोटों से भरा अपना कटोरा..! 
रोज शाम को ठेकेदार उठा लेता है,
मुठ्ठी भर नोट, उसके कटोरे से..!
और वह ढंग से आंसू भी नहीं पोछ पाता..!
मगर शर्त है कि मेरे दिये हाथों से वह,
कटोरा नहीं, ठेकेदार का गिरेबान जायेगा..!
उसकी हथेलियां बंध जायेगीं..!
तनी मुट्ठियों की शक्ल में और वह,
हर एक से अपना हिसाब मांगेगा..!

अपना रक्त देना चाहता हूँ मैं..!
उन मुफलिसी को जिनके लिए,
ब्लड बैंक के दरवाजे कभी नहीं खुलते..!

और अंत में अपना दिल..!
मेरी जान तुमको दे देना चाहता हूं..!
ताकि तुम मुझसे प्यार करके भी,
हमेशा पवित्र और अनछुई बनी रह सको..!

Wednesday, 11 November 2020

शर्मा जी, जाति को नहीं मानते

 *शर्मा जी,जाति को नहीं मानते*


शर्मा जी ने 90 के दशक की शुरुआत में पुलिस विभाग में नौकरी ज्वाइन की थी। तब से लेकर अब तक शर्मा जी प्रमोट होकर सब इंस्पेक्टर बन चुके हैं। शर्मा जी पिछले कुछ समय से सेक्टर में रहने लगे हैं। शर्मा जी ने जो अपने बच्चों को सिखाया उस में सबसे खास बात यह है कि उन्होंने अपने बच्चों को बताया कि जाति के आधार पर कोई भी छोटा बड़ा नहीं होता,सब बराबर होते हैं। किसी के साथ भी जाति के आधार पर भेदभाव नहीं करना है, हो सके तो किसी की जाति पूछनी भी नहीं है। आदर्श भारतीय बच्चों की तरह ऐसा ही शर्मा जी के बच्चे करते आए हैं उन्होंने कभी भी अपने दोस्तों की, ना अपने रिश्तेदारों की, ना अपने आस पड़ोस वालों की जाति पता करने की कोशिश की। शर्मा जी और शर्मा जी का परिवार अपनी जाति किसी को नहीं बताते। वह बात अलग है कि इनके नाम के पीछे शर्मा लगा हुआ है। शर्मा जी की बेटी बड़ी हो चुकी है। उसने पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ से मास्टर्स की है। बहुत होशियार है और शर्मा जी के परिवार में उनकी शादी को लेकर बातचीत चलती रहती है। शर्मा जी अपनी बेटी के लिए एक अच्छा सा लड़का ढूंढने में व्यस्त हो चुके हैं। एक बात जो शर्मा जी के सभी पड़ोसियों को परेशान किए हुए है वह यह है कि शर्मा जी अपनी जाति का लड़का नहीं ढूंढ रहे हैं शर्मा जी सिर्फ एक लड़का ढूंढ रहे हैं। कोई मायने नहीं रखता शर्मा जी के लिए कि लड़के की जाति क्या है? वह सिर्फ इतना चाहते हैं कि उनकी बेटी को एक अच्छा जीवन साथी हमसफ़र मिले जो उनकी बेटी को खूब प्यार दे, हर मुसीबत में उनकी बेटी के साथ खड़ा हो और पति न बनकर एक अच्छा दोस्त, एक अच्छा जीवन साथी उनकी बेटी का बन पाए। इसीलिए उन्होंने बहुत सारे रिश्ते देखे व बहुत सारे लड़कों के घरों पर गए shaadi.com जैसी वेबसाइट से पता करके भी लड़कों से मिलने गए अपनी बेटी को भी मिलवाने ले गए। 
उन्होंने अपनी बेटी से भी पूछा कि अगर उसको कोई लड़का पसंद हो तो वो उससे भी मिलने को तैयार है लेकिन लड़की की जिंदगी में ऐसा कोई लड़का था ही नहीं। ऐसे पिता भारत में दुर्लभ ही पाए जाते हैं जो अपनी बेटी का रिश्ता जाति से ऊपर उठकर करें और अपनी बेटी से ही पूछे हैं कि उसे कोई लड़का पसंद हो तो वह बता सकती है। 
अंत में एक लड़का शर्मा जी को पसंद आ गया। दोनों परिवारों की आपस में बातचीत हुई और दोनों परिवारों के बीच रिश्ते को लेकर भी बात बन गई। 
लेकिन एक गड़बड़ हो गई लड़के के पिता की इस बात में जिज्ञासा बढ़ गई कि शर्मा जी की असली जाति क्या है? लड़के के पिता ने खूब कोशिश की शर्मा जी से उनकी जाति पता करने की। शर्मा जी के बेटे से पूछा, बेटी से पूछा, उनकी पत्नी से पूछा लेकिन किसी ने भी जाती पर बात करने से मना कर दिया और कहा कि हम जाति को नहीं मानते हम सिर्फ इंसान हैं। जाति तो इंसान की बनाई हुई है इंसानियत सबसे ऊपर है। लेकिन भारद्वाज जी तो कसम खा चुके थे कि शर्मा जी की असली जाति पता करके रहेंगे बेशक शर्मा जी ने अपना गांव तक भारद्वाज जी को नहीं बताया था। भारद्वाज जी ने पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ में पढ़ रहे अपने भांजे से संपर्क किया। लड़की का नाम, पिता का नाम, माता का नाम, किस सत्र में मास्टर्स की थी वह सेशन, परसेंटेज सब बताया और कहा कि इस लड़की की कैटेगरी पता करो। लड़का विश्वविद्यालय में एक देशभक्त छात्र संगठन में सक्रिय था उसने अपने नेता जी से बात की और लड़की की कैटेगरी खोज निकाली। जब भारद्वाज जी को पता चला कि लड़की की कैटेगरी ओबीसी यानी कि अन्य पिछड़ा वर्ग है तो आग बबूला हो गए तुरंत शर्मा जी के पास फोन लगाया और गुस्से में शर्मा जी पर टूट पड़े,"तुम्हें हम अपने बराबर में ना बैठायें और तुम अपनी बेटी का रिश्ता मेरे बेटे के साथ करने चले आए। तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरा धर्म भ्रष्ट करने की? क्या तुम्हें नहीं पता की शादी के लिए गुणों के साथ-साथ जाति का मिलना भी बहुत जरूरी है?" भारद्वाज जी ने गालियां भी दी और भी न जाने क्या-क्या कहा और अंत में फोन काट दिया। इसके बाद भारद्वाज जी ने शर्मा जी के एक पड़ोसी को इसके बारे में बताया। बस फिर क्या था पूरे सेक्टर को शर्मा जी की जाती पता चल गई। लेकिन शर्मा जी अभी भी अपनी बेटी के लिए लड़का ढूंढ रहे हैं और बिना किसी जाति को ध्यान में रखे ढूंढ रहे हैं। अंत में बस एक छोटा सा सवाल बचा है कि शर्मा जी जाति को नहीं मानते लेकिन फिर भी उन्होंने नाम के पीछे शर्मा लगाया जबकि उनका वास्तविक गोत्र या सरनेम कुछ और है, आखिर ऐसा क्यों?